दूसरी क़िस्त

गर्मियों मे लखनऊ जाने की तैयारी दो महीने पहले ही शुरू हो जाती| गोया कोई त्यौहार की तैयारी हो आरक्षित सीटों का कोई झंझट होता नहीं था| आज के माफिक ट्रेनों मे इतनी भीङ नहीं जुटती थी| महीने भर के लिए एक बड़ा ट्रंक ले लिया था सबके कपडे उसी मे समा जाते| आज की तरह फैशन नुमा बैगों या "strolly" का रिवाज़ न था|
बिना आरक्षण ट्रेन मे सीट पा लेना दीना बाबू के ही बस मे था| और ये हुनर वे बखूबी अन्जाम तक पहुँचाते थे|भाग्य साथ न देता तो मज़बूत ट्रंक तो था ही|
   दीना बाबू जुगाड़ भीड़ा लेते| जब भी कोई सीट खाली होती | चील की तरह झपट उस पर किसी लड़के को टिका देते| बड़े लड़के की थोड़ी ढाढ़ी- मूँछ उग आई थी इसलिए ये टिकने-टिकाने का खेल उसे नहीं भाता था|
  लखनऊ का उनका खानदानी घर था| उनके पिता की बहुत पैठ थी इस शहर मे|रिश्तेदारी मे अच्छी  पहुँच थी| सबमें दीना बाबू"भैया" के नाम से जाने जाते| जो "भैया" के आने की खबर होती तो रिश्तेदारो की भीड़ आ जुटती|
  उनकी अम्मा कितनी बार गुहार लगा चुकी थी "काहे वहाँ माथा फ़ोड रहे हो | काहे नहीं यही आ बस जाते" पर दीना बाबू को जाने अम्मा की कौन से बात चुभ गयी थी जो अपनी कमाई से ही अपने परिवार को पालने की ठानी थी|अम्मा के पैर सहारनपुर मे न टिकते| अक्सर कहती" का हो बचवा, सारी रिश्तेदारी छोड इस जंगल मे पड़े हो"
   साल मे एक बार आना अम्मा के लिए भी कौन सा त्यौहार से कम था|कनस्तर भर भर आटे के बिस्कुट बनवाना,सारे मेवे जुटा रखना,माठिया-दालमोठ बनवा लिए जाते| साल भर का बंद पड़ा कमरा धो-पोछ साफ़ कर दिया जाता| जरुरत की सारी चीज़े जमा दी जाती|
     बस इंतज़ार रहता भैया के आने का

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