नेहा को अहसास तो था कि वैदेही कुछ अकेली सी रहती हैं| घर का काम खत्म करके वो अक्सर बालकनी में आ थम लेती| मानो अकेले में अपने को तलाश रही हो| उसके पति को कभी उससे गपिया लेते हुए उसने नहीं देखा|
वैदेही और नेहा इतने करीब तो हो गये थे कि अपना बरसो का उबाल खाता मन नेहा के सामने जब खोलती तो कई बार नेहा भी सिहर उठती| कोई आदमी परिवार में रहते भी अपने बीबी-बच्चों से इतना विलग कैसे रह सकता हैं?
वैदेही ने ही एक बार बताया था कि पैसे बचाने के चक्कर में ही बच्चों को सरकारी स्कुल में दाखिला दिलवाया हैं| वो तो बस मन मसोस कर ही रह गयी|आज के माहौल में अपनी पटरी बिठाने को जो अग्रेंजी भाषा की पुख्ता जमीन होनी चाहिए थी उसका अभाव था|आगे बड़ी कपंनियो में "interview"के लिए अग्रेंजी की स्तरी समझ कितनी काम आती?
उस दिन वैदेही की बेटी सुबह ही घबराई हुई आई ये बताने कि मम्मी के पेट में भयानक दर्द उठ रहा हैं और पापा भी घर पर नहीं हैं| उन दोनो का पहला पेपर हैं बोर्ड का|बेटी की नन्हीं बुद्धि ये सोच ही नहीं पा रही थी कि कदम कहाँ बढ़ाये|
नेहा भागते हुए नीचे गयी| तब तक नीचे वाली भाभी और वैदेही के सामने वाली भाभी आ चुकी थी| दोनो दर्द से तड़पती वैदेही को संभाल रहे थे| दोनो बच्चे माँ की हालात देख और पेपर के छुट जाने के भवंर के बीच डुब-उतरा रहे थे| नेहा ने दोनो बच्चो से अपना पेपर दे आने को कहा और ढांढस बढ़ाया कि माँ की ओर से चिंता छोड़ अपना पेपर दे आये| वैदेही को दोनो भाभियों और भाभी के पति के साथ अस्पताल रवाना किया और खुद उन बच्चो के लिए कुछ बना देने के लिए अपनी रसोई की ओर बढ़ गयी| बच्चे जिद पकड़े रहे कि ऐसे माहौल में हमारे हलक के नीचे अन्न का एक दाना न जा पाएगा| नेहा ने कुछ खिला कर ही उन्हें रवाना किया|
उधर वैदेही के सारे टेस्ट हो गये और रिपोर्ट शाम तक आ जाने की बात हुई| जब तक वैदेही वापस आई नेहा दोनो बच्चो को स्कुल के लिए रवाना कर चुकी थी| इतने दर्द में भी बस उसे बच्चो की ही चिंता रही|
शाम को आयी रिपोर्ट यही बता रही थी कि वैदेही के "gall bladder" में पथरी हैं|आगे के लिए डॉक्टर ने अॉपरेशन करवा लेने की ही सलाह दी|
शाम तक वैदेही के घर में भाभी की सारी मिञ-मंडली हाजिर थी केवल हंसी ठहाके लगाने को नहीं बल्कि अपने-अपने स्तर पर वैदेही की मदद कर देने को|
आज शाम ही नेहा का भाभी के स्वभाव के एक नये रुप से परिचय हुआ| अपनेपन से सराबोर|
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