उस दिन के बाद से वैदेही और नेहा के बीच का अबोला जो खत्म हुआ तो वैदेही भी उससे थोड़ा खुल सी गयी| बालकनी में खड़ी उसके अधरों में अब नेहा को देख एक स्निगध मुस्कान तैर आती|
भाभी को दोनो के मिलने की खबर न लगी हो ऐसा हो नहीं सकता था| आस-पास की सारी कामवालियाें से भाभीजी की दुआ-सलाम होती थी सो कोई बात उनके नाक के नीचे हो और उन्हें खबर न हो ऐसा हो नहीं सकता था|
इस बार जब नेहा भाभी के जाने को हुई तो वैदेही को भी संग कर लिया|वैदेही इस पर ही राजी हुई साथ होने की उसे एक दिन पहले ही कही चल लेने का पता हो तो वो सारे काम उसी मुताबिक निपटा ले|उन दोनो के साथ आने पर भी भाभी ने कोई तंस नहीं कसा| भाभी की यही तो खुबी थी कि वो वक्त देख लगाम कसती थी|
वैदेही का सबसे मिलना हुआ|अपने खोल से ज्यादा बाहर भी न निकली पर नेहा को अहसास हो रहा था वैदेही की खुशी का|फटाफट वैदेही के यहाँ काम वाली का इंतजाम भी भाभी ने करवा दिया|घर बैठे दूसरो के घर का हाल लेने का इससे सुगम तरीका और क्या हो सकता था?
कुछ ही महीनो के अतंर ने दोनो को और करीब ला दिया|शायद इसलिए भी कि दोनो हमउम्र ही थी|कुछ महीनो की छोट-बड़ाई हो सकती थी|वैदेही ने अपने दिल की कुछ परते खोली तो उसे पता लगा कि यूँ तो पैसो की किल्लत नहीं हैं पर तनख्वाह का ज्यादा हिस्सा किसी न किसी रुप में उसके ससुराल पहुँच जाता हैं|बच्चो को कुछ बड़ी जरुरतो को पूरा करने के लिए महीनो अपने पापा का मुँह जोहना पड़ता हैं|
नेहा के अदंर ये सुन भीतर तक कुछ दरक गया|वैदेही की सारी बात उसने एक तमाशबीन की तरह नहीं बल्कि एक सच्चे हमदर्द की तरह सुनी|
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