दोपहर होने को आयी और अभी भी सफर का एक पढ़ाव बाकी था|तकरीबन चार- पाँच घंटे तो वो मान कर चल रही थी| अगर ट्रेन की लेट लतीफी का यही आलम न रहा तो|
खाना करीब खत्म ही होने को था|फिर रात और सुबह से पूड़ी-सब्जी के निवाले मुँह में धकेलना हो नहीं पा रहा था| अतः नामा ने रसोई यान से ही कुछ मगंवा लेना ठीक समझा| पर ट्रेन के देर होने की वजह से रसोई यान की व्यवस्था डगमगा गयी थी| सिर्फ वेज बिरयानी के खाने का कोई दूसरा विकल्प न था| वही मंगवा लिया|
वेज बिरयानी तो आई पर अकेले| साथ में दही, अचार जैसा कोई दोस्त नहीं था| जब बिरयानी का डिब्बा खोला तो वो भी बिना दोस्तो के बहुत उदास दिखी|इतनी की नीमा को उसको खा लेने से मन हट गया| उबले चावलो में सब्जियाँ छितरा भर दी थी| मसालो के नाम पर नमक ही पड़ा था|जब खाया तो चावल भी ढंग से नहीं पके थे|
तकरीबन खाली होती ट्रेन में इस बात पर भी पंगा लेना ठीक नहीं लगा उसे और न ही अधपके चावल खा पेट दर्द से खुद उछलते जाना|सो उसने खाने का डिब्बा एक तरफ खिसका देना ही ठीक समझा|
दोपहर खिसक कर शाम में तबदील होने लगी| नीमा की बैचेनी बढ़ने लगी| गनीमत यही थी कि सामने एक जोड़ा बैठा था|वो भी ट्रेन के इन नखरो से ऊब गये थे और कही बीच के स्टेशन पर उतर लेने की बात कर रहे थे | उनका सामान भी ज्यादा था इसलिए उतरने में हिचक रहे थे|
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