पांचवी किस्त

सामने बैठी आंटी ने ही सुझाया कि पर्स को ही ठीक से टटोलो|शायद बात बन जाए|
     उन महाशय का प्रवचन बराबर जारी था| आगे के 'तमाशे' के लिए इंतजार भारी पड़ रहा था उनके लिए|
   नीमा ने जैसे उसका होना बिल्कुल नकार दिया| नीमा को एकदम ध्यान आया कि पर्स के अंदर की पॉकेट तो उसने खोल कर देखी ही नहीं|चूंकि जिप का रंग उस पर लगे कपड़े से मेल खाता था अतः उस पर नीमा का ध्यान ही नहीं गया|
     उसने जेब टटोली तो उसे अपनी किस्मत पर विश्वास न हुआ| उस जेब में उसका ' पहचानपञ' पूरी शान से पड़ा था| नीमा को कितनी राहत मिली बयान करना मुश्किल था| अभी नीमा ने किसी को अहसास न होने दिया कि नया पहचानपञ उसे मिल चुका हैं|
     काफी देर गये तक जब टी़टी नहीं आए तो उसे यही लगा कि अब न आयेगे|पर टी़टी आए और वो महाशय सजग हो गये| पर ये क्या नीमा ने तो अपना नया , चमचमाता पहचानपञ आगे कर दिया|टी.टी और उन महाशय दोनो के मुँह लटक गये और नीमा के चेहरे पर विजयी मुस्कान तिर आयी|
     उसके बाद से वे महाशय चुपचाप पड़े रहे | जब आसनसोल में मय असबाब के वो उतर गये तब नीमा ने राहत की सांस ली|
   इस वाक्ये से नीमा को एक सबक मिल गया था| फिलहाल तो गाड़ी की लेट लतीफी जारी थी|कलकत्ता पहुँचते जाने कितनी लेट हो|
       नीमा की खाना रख लेने की आदत काम आ रही थी| पर ज्यादा देर होने से खाना भी कहाँ तक साथ निभाता?
      नीमा के साथ बैठे याञी एक एक कर उतर गये|किताब पढ़ने बैठी पर उसमें नीमा का मन नहीं लगा| अब वो चाह रही थी कि जल्दी से ये सफर खत्म हो|

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