नीमा जब निश्चित हो गयी सब तरह से तो आराम से पैर ऊपर कर बैठ गयी|रेल का सफर शुरु से ही उसे पसंद था|बच्चे भी साथ होते थे तो सफर का मजा ही दूसरा होता था|पर जीवन हर बार नये अनुभव लेकर आता हैं|उसे निभा ले जाना ही समझदारी हैं|
रेल याञा में खिड़की से बाहर निहारते रहना भी नीमा को पसंद था| रात में भी दूर दूर तक फैली रोशनी निहारना उसे बहूत भाता था|पर वातानूकुलित डिब्बे से रात में कुछ भी देख पाना कहाँ सभंव था|अब वो मना रही थी कि सहयाञी बात करने वाले मिले| नहीं तो इतना लंबा सफर एक अदद किताब के सहारे निकाल लेना कितना कठिन होगा|
ये सब सोचना ही हो रहा था कि साइड सीट पर एक सज्जन का आना हुआ|वे शायद पूरी गृहस्थी ही लेकर चले थे| उनका सामान जब उनकी तरफ की सीटो के नीचे नहीं अट पाये तो इस ओर की सीटो के नीचे जगह तलाशने लगे|नीमा चुप बैठी रही| और लोग भी मूँह बंद किए बैठे थे| अजनबी से बात करना वैसे भी उसे नहीं भाया|
नीमा का सामान इधर-उधर कर जब अपना सामान जमाने की जुगत करने लगे तब नीमा से नहीं रहा गया| हंलाकि उसने अपनी स्ट्रौली में बड़ा सा ताला डाल रखा था पर अकेली होने से ज्यादा ही सर्तक हो गयी थी| उसे कई किस्से याद आ गये कि कैसे बिना ताला खोले बैग के अंदर का सामान गायब कर लिया जाता हैं|
कुछ ये चिंता और कुछ अपने को कमजोर न दिखाने की ललक से उस अजनबी को दो-चार सुनाने को उठ ही गयी|
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