चेन न मिलने से मेरा जो हाल होना था वो तो हुआ पर माँ के सामने असली समस्या पैदा हो गयी| मेरा हठ देख चेन पहन लेने की पैरवी माँ ने की थी| पापा तो इसके खिलाफ ही हो गये थे| और अब पापा को कैसे बताया जाए माँ के सामने यही मुद्दा सिर उठाए खड़ा था| मैं तो माँ के पीछे दुबक ली थी|
मध्यम वर्ग के हिसाब से ये नुकसान बहुत बड़ा था पर यहाँ बात महज पैसो की नहीं थी|इस चेन के साथ जुड़ी 'भावनाओं' की थी| दादी ने बड़े चाव से ये चेन मुझे दी थी| फिर खानदानी जेवर का ठप्पा भी लगा था|सो चेन का कीमती हो जाना लाजमी था|
पापा को पता लगा तो गुस्सा बहुत आया उन्हें पर जब माँ की ओट से झांकती मेरी निरीह आँखो को देखा तो सारा गुस्सा पी गये|वैसे भी पापा की लालड़ी थी मैं|
फिर हुआ यूँ कि घर के पास ही पापा के बहुत ही करीबी दोस्त' गुप्ता अंकंल' रहते थे| उनको गुहार लगायी और सारी बाते बतायी गयी| अंकंल खुशमिजाज तबीयत के थे| और आर्मी पृष्ठभूमि होने से तुरंत निर्णय लेने की गजब की ळमता थी उनमें|सो उन्होनें ही पापा से तुरंत वापस 'क्लब' चलने का सुझाव दिया| शायद किस्मत साथ दे जाए| अंकंल के जोर देने पर पापा जाने को तैयार हो गये|
उन दिनो पापा के पास 'लेमब्रेटा'स्कुटर हुआ करती थी| मजबूत, दमदार और टिकाऊ| पापा ने पीछे की तरफ "स्टेपनी" लगवा ली थी सो हम पाँच लोगो का परिवार उसमें अट जाता था|
खैर, अभियान शुरु हुआ| चेन ढुंढ लेने का| पापा अंकल के साथ सारे रास्ते स्कुटर की 'headlight' जलाते चले शायद कुछ चमक जाए| चमका तो बहुत कुछ पर वो सोने की चेन न थी|
क्लब पहुँच सबसे पहले वहाँ गये जहाँ मैं बैठी थी| सारा खोज डाला पर कुछ हाथ न आया| नौकरो की फौज घूम रही थी पर किसी से कुछ पूछ लेना ठीक न था|
पापा और अंकल वापस आ गये|पर ये क्या अंकल माँ से कह रहे थे,' भाभीजी कल बढ़िया खाना खिलाइए|' पापा, माँ और मैं हक्के-बक्के अकंल का मुँह ताक रहे थे कि ये कह क्या रहे हैं| और फिर अंकल ने अपनी जेब से चमचमाती सोने की चेन निकाल माँ के हाथो में थमा दी|
हम सब के मुँह खुले रह गये| शब्द भी साथ छोड़ गये थोड़ी देर के लिए|कुछ उभरे इस " शॉक" से| तब अंकल ने ही बताया कि हम लोग तो वापस आ ही रहे थे पर लकड़ी के फर्श पर कुर्सी की ओट में कोई चीज चमकती दिखाई पड़ी सो यूँ ही हाथ डाल देखना चाहा कि हैं क्या तो ये चेन ही हाथ में आ गई| चूकिं चेन ओट में पड़ी थी इसलिए किसी का ध्यान उस तरफ नहीं गया|
पापा को इसलिए नहीं बताया कि थोड़ी देर तो चेहरे पर उड़ती हवाईयों का मजा़ ले सके|
अकंल की इस बात ने माहौल को एकदम हल्का कर दिया|और अकंल की परिवार सहित दूसरे दिन की 'ट्रीट' पक्की हो गयी|
उस दिन के बाद से इतना दूर भागी कि बरसो तक फिर न पहनने की ही ठानी| सीख जो मिल गयी थी एक|
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