रूचि की सुबह आँख खुली तो उसके पपड़ाये, सुखे होठो पर मुस्कान तिर आयी|सामने खिड़की पर गोरैया बैठी थी| छोटी सी, भूरा आवरण ओढ़े| विलुप्त सी होती जाती|
रूचि तकरीबन एक महीने से बीमार चल रही थी| शुरू में तो हल्का बुखार था पर बाद में बुखार ज्यादा रहने लगा| डॉ. भी पहले वॉइरल ही बता रहे थे पर जब पाँच दिन का भी समय पूरा हो गया| तब डॉ. नेतमाम टेस्ट करवा लेने की फेहरिस्त थमा दी|
सारे टेस्ट की रिपोर्ट भी आ गयी| डॉ का यही मानना था कि रिपोर्ट सारी ठीक हैं मरीज ही इलाज में सहयोग नहीं कर रहा|
रुचि के अंदर ये बात बैठ गयी कि इतने दिनो का बुखार जरुर उसके अंदर कोई बीमारी पल रही हैं| रिपोर्ट गलत बता रही हैं| अब उसका मरना तय हैं|
सारे परिवार वाले हार गये समझाते कि तुम्हारी रिपोर्ट ठीक हैं| तुम जरुर ठीक हो जाओगी| पर रुचि के मन का कीड़ा नहीं निकला|
आज जो इतने दिनो बाद गोरैया बैठी देखी अपनी खिड़की पर तो ये बहुत ही शुभ सकेंत ले आयी थी रुचि के लिए| आज के पहले कभी गोरैया का उसकी खिड़की पर बैठना न हुआ था|
उस दिन के बाद से रुचि की तबीयत में लगातार सुधार होने लगा|
उस दिन रुचि की खिड़की पर गोरैया का बैठना कोई इत्तिफाक नहीं था| रुचि के घर के पड़ोस में सुचित रहता था| रुचि एकदम भाई की तरह स्नेह रखती थी उससे| रुचि का ये हाल देख सुचित व्यथित हो उठा| उसे पता था दीदी गोरैया का देखना कितना शुभ मानती हैं| और उसकी बाल- बुद्धि ने वो कर दिखाया जो बड़े से बड़ा डॉ. और सुचित के माँ-पापा न कर पाए|
गोरैया का रुचि की खिड़की पर बैठना सुचित के ही दिमाग की उपज थी|
की सुबह आँख खुली तो उसके पपड़ाये, सुखे होठो पर मुस्कान तिर आयी|सामने खिड़की पर गोरैया बैठी थी| छोटी सी, भूरा आवरण ओढ़े| विलुप्त सी होती जाती|
रूचि तकरीबन एक महीने से बीमार चल रही थी| शुरू में तो हल्का बुखार था पर बाद में बुखार ज्यादा रहने लगा| डॉ. भी पहले वॉइरल ही बता रहे थे पर जब पाँच दिन का भी समय पूरा हो गया| तब डॉ. नेतमाम टेस्ट करवा लेने की फेहरिस्त थमा दी|
सारे टेस्ट की रिपोर्ट भी आ गयी| डॉ का यही मानना था कि रिपोर्ट सारी ठीक हैं मरीज ही इलाज में सहयोग नहीं कर रहा|
रुचि के अंदर ये बात बैठ गयी कि इतने दिनो का बुखार जरुर उसके अंदर कोई बीमारी पल रही हैं| रिपोर्ट गलत बता रही हैं| अब उसका मरना तय हैं|
सारे परिवार वाले हार गये समझाते कि तुम्हारी रिपोर्ट ठीक हैं| तुम जरुर ठीक हो जाओगी| पर रुचि के मन का कीड़ा नहीं निकला|
आज जो इतने दिनो बाद गोरैया बैठी देखी अपनी खिड़की पर तो ये बहुत ही शुभ सकेंत ले आयी थी रुचि के लिए| आज के पहले कभी गोरैया का उसकी खिड़की पर बैठना न हुआ था|
उस दिन के बाद से रुचि की तबीयत में लगातार सुधार होने लगा|
उस दिन रुचि की खिड़की पर गोरैया का बैठना कोई इत्तिफाक नहीं था| रुचि के घर के पड़ोस में सुचित रहता था| रुचि एकदम भाई की तरह स्नेह रखती थी उससे| रुचि का ये हाल देख सुचित व्यथित हो उठा| उसे पता था दीदी गोरैया का देखना कितना शुभ मानती हैं| और उसकी बाल- बुद्धि ने वो कर दिखाया जो बड़े से बड़ा डॉ. और सुचित के माँ-पापा न कर पाए|
गोरैया का रुचि की खिड़की पर बैठना सुचित के ही दिमाग की उपज थी|
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