छठी किस्त

इस सफर का एक लंबा रास्ता जंगल से हो गुजरता था|लूट- पाट के लिए अनुकूल| इस जगंल से गुजरते रास्ते की वजह से लोग यहाँ से निकलना ,खासकर रात में, बचते थे| रवि ने गाडी़ की रफ्तार थोड़ी और बढ़ा दी ताकि इस रास्ते से जल्द छुटकारा मिले| सुलभा ने इसका पुरजोर विरोध किया|रवि को अभी कुछ भी मान लेना बिल्कुल नहीं समझ आ रहा था|
    सड़क हाल में ही बनी थी| गाड़ी एकदम फर्राटे से चल रही थी पर सड़क की चौड़ाई ज्यादा न थी|आमने-सामने आती गाड़ियो में ज्यादा फासलो की गुंजाइश नहीं बचती थी| ऊपर से सामने से आती गाड़ियो की तेज रोशनी आँखे चुंधिया जाती थी|
    सुलभा मन ही मन मना रही थी कि ये सफर जल्द खत्म हो| भगवान ने जैसे उसकी सुन ली|
    रवि को नींद का एक तेज झोंका आया और उसकी गाड़ी लहरा गयी| रवि ने बहूत कोशिश की कि वो वक्त रहते गाड़ी संभाल ले पर नियति को कुछ  और मजूंर था|जब तक रवि संभलता समय फिसल ही तो गया उसके हाथो और फिसल गयी सबकी किस्मत|
   गाड़ी की स्पीड बहूत ज्यादा थी और संभलते-सभंलते भी सड़क के किनारे खड़े तेल के टेकंर में जा धंसी| सब कुछ इतना अचानक हुआ कि किसी को संभलने का मौका मिला हो ऐसी संभावना कम लगी|
   गनीमत यही थी कि मौसम ठंडा होने की वजह से कार के शीशे खुले हूए थे| टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि रवि -सुलभा का उसी समय अंत हूआ| पीछे बैठी सौम्या-सोनल जबरदस्त झटके और अचानक हुए हादसे से बेहोश हो गयी|
    हादसा एक ढाबे के नजदीक हुआ था इसलिए तुरंत मदद पहुँच गयी|सौम्या-सोनल के शरीर पीछे और आगे की सीट के बीच धंस गये थे| उनको बड़ी मुशिकल से बाहर निकाला गया|कार के आगे का भाग बुरी तरह पिचक गया था वहाँ कोई होगा इसका अनुमान लगाना भी मुशिकल था
    सौम्या-सोनल को अभी तक ये अनुमान न था कि वे अपने मम्मी-पापा को खो चुके हैं|
        

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