रवि गाड़ी की रफ्तार धीमी बनाए हूए थे| समय ज्यादा खप गया था पर आधे से ज्यादा रास्ता पार कर लेने का सुकून भी सबके चहेरे पर तारी था|
रात के ८.३० हो चुके थे| सुबह से आपा- धापी में ढंग से कुछ पेट में पड़ा नहीं था|भुख सबको लग आयी थी पर सुलभा पहल कर समय बरबाद करना नहीं चाहती थी| जल्द से जल्द घर पहुँच जाना चाहती थी|रवि और सुलभा दोनो पर थकान हावी होने लगी थी|
बेटियों ने ही कहा कि, " पापा कहीं कार रोक खाना खा लेते हैं|भुख लग रही हैं|"
दो बेटियों ने कहा तो रवि भी कही कार रोक कुछ खा लेने को तैयार हो गये|वैसे भी घर पहुँचते देर हो जाती और सबकी भुख मर जाती|
सुलभा से रहा न गया| बोल ही उठी,"ढाबे में बैठ खाना खाने से आधा घंटा खप जाएगा|खाना बंधवा कर कार में ही खा लेगे|"
सुलभा की ये बात किसी के गले के नीचे से नहीं उतरी|रात तो हो ही चुकी थी| अब उसमें आधा घंटा और खप भी जाता तो क्या आफत थी|आराम से बैठ दो निवाले तो तोड़ लेगे|जब तीनो एक तरफ हो गये तो सुलभा को हथियार डालने ही पड़े|
" ठीक हैं भाई तुम तीनो जीते|तुम लोगो से बहस में वैसे भी कोई जीत न पाया आज तक| पर जल्दी निपट ले खाने से | ज्यादा रात करना भी ठीक नहीं|", सुलभा बोली तो रवि भी बोल उठे , " जो हुकुम सरकार"|
इतनी देर से रवि के चहेरे पर छाया तनाव काफी हद तक कम हो गया था|
खाने से निपटते ९.०० से ज्यादा हो गये|रवि पर थकान तारी हो ही रही थी| सवेरे से पीठ सीधी कर लेने की भी फुरसत न हूई थी|खाना ज्यादा ही खा गये थे रवि|शायद इसलिए नींद के झोकें भी हावी होने लगे थे| रवि अब चाहने लगे कि जल्दी से यहाँ से घर तक का फासला खत्म हो| अतः उसने कार की स्पीड बढ़ा दी|
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