चारो रवाना हो लिए| बारिश की वजह से कुहासा सा छाया था|सड़के फिसलनी हो गयी थी| रवि तनाव में था पर ये बात उसने जाहिर नहीं होने दी|काफी दूर निकल आने पर रवि के साथ सुलभा भी निश्चित हो गयी थी| उनकी आपस में हल्की फुल्की बातें शुरु हो गयी| बातो बातो में सौम्या ने कुछ ऐसी बात कही की सभी ठहाका लगा हंस दिए|इन सब बातो से रास्ता कब कट गया पता ही नहीं लगा|
जब वे पहुँचे तो convocation शुरू ही होने जा रहा था|सारे बच्चे जिन्हें डिग्री मिलनी थी, उनके चेहरे गर्व की अनुभूति से दमक रहे थे|इसी पक्तिं में सौम्या जब बैठी तो रवि-सुलभा का मन कैसा उल्लासित हो उठा इसका वर्णन करना कठिन था|
कार्यक्रम चल ही रहा था कि रवि के पास एक फोन आया जिससे रवि थोड़ा परेशान हो उठा|सुलभा ने पुछा तो रवि को कहना ही पड़ा," एक जरुरी काम आन पड़ा हैं | कल सवेरे तक नहीं निपटाया तो व्यापार को भारी नुकसान होगा| सौम्या को डिग्री मिलते ही हमें रवाना होना पड़ेगा| अभी चल देगे तो दिन रहते वापस पहुँच जाएगे|"
लेकिन सारे काम सोचे अनुसार होते हैं क्या?सौम्या का नाम आते और सारी औपचारिकता पूरी करते ६.०० बज गये| सुलभा आते समय की सारी परेशानी देख चुकी थी इसलिए उसने अभी न चल दूसरे दिन तड़के निकल चलने की राय दी| रवि कुछ ज्यादा उलझा था इसलिए उसने सुलभा के दिए सारे तर्को को अपनी दलीलो से शांत कर दिया|
आखिरकार वे सब ६.०० बजे के कुछ बाद वहाँ से रवाना हुए| रवि सचेत हो गाड़ी चला रहा था|आज उसे ड्राइवर लेकर न चलने का अफसोस हो रहा था|सुलभा ने बेटियों को ताकीद कर दी कि ड्राइव करते समय कोई बात नहीं| ध्यान बटँते देर नहीं लगती|सौम्या-सोनल समझ रही थी वक्त की नजाकत इसलिए दोनो कान में ईयरफोन डाल अपने मोबाइल में उलझ गयी|
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