मौसम बहूत खुशगवार था| बादल छाये थे|बीच बीच में धूप की लुका- छुपी जारी थी|कुल मिला कर सारी बाते अनुकूल थी|
सारे कामो से फारिग हो पूरा परिवार लगभग ९.०० बजे घर से निकला| सुलभा के हिसाब से फिर भी थोड़ी देर हो गयी थी| पर उसने चुप रहना ही ठीक समझा| कहने से तीनो उसकी जम कर खिचांई करते|
सहरनपूर से दिल्ली तक की दूरी ही तो नापनी थी| वैसे भी कार्यक्रम ३.०० बजे तक शुरू होना था| वक्त बहूत था|
घर से निकल आधी दूरी भी नहीं नापी होगी कि मौसम ने अपने मिजाज दिखाने शुरू कर दिए|काले घने बादल छा गये और थोड़ी ही देर में भारी बारिश शुरु हो गयी|
सुलभा का मन ऐसे मौसम में बेतरह घबराता था| लंबी दूरियों के लिए सुलभा ड्राइवर को ही लेना बेहतर समझती थी पर रवि ने इस बार खुद ही कार चलाना चाहा|
जो मौसम का ये मिजाज बना तो सुलभा ने पानी ठहर जाने तक कही रूक लेने की सलाह दी| रवि मनोदशा समझ पा रहा था इसलिए कही रूक लेना ही उसने बेहतर समझा|फिर ऐसी बारिश और फिसलती सड़को पर गाड़ी चलाने का उसका अनुभव न था|
ड्राइवर न लेकर चलने का सुलभा को बहूत अफसोस हो रहा था पर एक ही बात को तुल देकर सबका मन खराब करने का कोई तुक नहीं लगा उसे|
काफी देर होने लगी थी| बेटियाँ भी बेसब्र होने लगी थी इसलिए रवि ने ही कहा," कब तक यूँ ही बारिश थमने का इंतजार करते रहेगे| अब ज्यादा देर करना ठीक नहीं| वक्त पर न पहूँचे तो जाने का कोई फायदा न होगा|धीरे ही ड्राइव करूगा| अब तो इजाजत दे दीजिए|" ऐसा कह रवि ने माहौल हल्का करने की कोशिश की|
सुलभा का मन नहीं बन पा रहा था पर रवि भी ठीक कह रहे थे| जो अभी न चले तो देर हो जाएगी| आखिरकार उसे हामी भरनी ही पड़ी|
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