सौम्या और सोनल|दोनो बहनो में अगाध प्रेम था| घंटो आपस में जूड़ी जाने बातो का कौन सा खजाना खोल बैठती थी|
" उठो , मेरी बच्चियों| याद नहीं आज हमारी जिदंगी का कितना बड़ा दिन हैं|" सुलभा बोली|
सोनल चहक उठी, ' दी को ढेरो बधाई अभी से| फिर तो दी भाव नहीं देगी इसलिए अभी मेरी बधाई ले लीजीए|
सौम्या नींद की खुमारी में थी| हसंते हूए बोल उठी, " ठहर मेरी नानी तेरी बधाई अभी लेती हूँ"और लाड़ से अपनी बहन के गाल थपथपा दिए|
माँ, " आज का दिन कैसे भूल सकती हूँ|आज जिस मुकाम पर हूँ केवल आप की वजह से|आप संबल बन न खड़ी होती तो आज का दिन कहाँ मुमकिन था|"
सुलभा मुस्कुरा उठी पर सामने से बोली,"अच्छा-अच्छा अब ये सब बाते रहने दो और फटाफट बिस्तर छोड़ो| दोनो मिल कर बिस्तर ठीक करके बाहर आओ| नाश्ता भी बता दो क्या बनना हैं? जितना जल्दी करोगे उतनी जल्दी निकल पाएगे|
" ओ.के माँ, सैल्यूट मारती सोनल बोली तो सब हंस दिए|
रवि अपने कमरे से चाय की चुस्कियाँ लेते निकले," सूबह- सूबह तुम सबका शुरू हो गया भाई|कभी हमें भी शामिल कर लिया करो| तुम सबने इस गरीब को एकदम अलग कर दिया हैं|"
सौम्या और सोनल पापा से लाड़ दिखाती बोल उठी,"पापा आप तो हमेशा हमारे ग्रुप में शामिल हैं|"
रवि भी हंस दिए,"मक्खन मंहगा हो गया हैं बच्चो"|
रवि की इस बात पर सब खिलखिला कर हंस दिए|
सुलभा बोली,"बस-बस अब जल्दी करो नहीं तो निकलते देर हो जाएगी|नाश्ता क्या बनना हैं आप लोग तय कर जल्दी बताओ" सुलभा बोल रसोई की ओर बढ़ चली|
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