सातंवी किस्त

सौम्या और सोनल को निकाल कर गाड़ी के दूर ले जाया गया| उनके पीछे आग का एक जोरदार धमाका हुआ और कार - टेंकर धू-धूकर जल उठे|
    सौम्या और सोनल को जबरदस्त मानसिक धक्का लगा था| संभलना बहूत कठिन था| सोनल की हालात ज्यादा नाजूक थी| उसे बार-बार बेहोशी छा रही थी|
      सौम्या ने थोड़ा साहस दिखाया और अपने चाचा को फोन किया जो उसी शहर में रहते थे|आनन फानन में चाचा सहित कई रिश्तेदार आ जुटे| सबने सौम्या-सोनल को संभाल लिया| किसी को यकीन नहीं होता था कि कल का हंसता-खेलता परिवार यूँ अंत को पाएगा|
           सबसे संबल देने वाली बात ये थी कि सारे रिश्तेदारो ने रात दिन एक कर दिया था| सारे  काम पूरे करने और दोनो बहनो को मानसिक सहारा देने में|
     आघात बड़ा था संभलने में वक्त तो लेता ही|सारे रिश्तेदारो की सार-संभाल का ही नतीजा था कि सौम्या ने तय कर लिया कि जो सपना उसके पापा-मम्मी ने उसके लिए देखा था उसे पूरा करना ही होगा| सोनल को संभाल लेने की जिम्मेदारी भी उसने पूरी तरह अपने ऊपर ले ली|
      इतने फैले हूए व्यापार को भी देख लेने की जिम्मेदारी भी सौम्या पर ही आन पड़ी|वक्त ने कुछ पहले ही उसे बड़ा और जिम्मेदार बना दिया था|पापा-मम्मी हमेशा उसके आस- पास ही बने हैं ऐसा उसे हमेशा भान होता था|उसने माना ही नहीं कि अब वे दोनो उनके साथ नहीं हैं| ऐसी सोच उसे संबल देती थी|
   वक्त से बड़ा मरहम कोई नहीं होता|सौम्या ने ठान लिया था कि वो खुद और सोनल को निकाल लाएगी इस हादसे से|

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