सुबह का समय था| दोनो बहने अपने कमरे में ही थी|इतने में नीचे के कमरे से आवाजे आने लगी ऐसी जैसे कोई रो रहा हो|
सौम्या जल्दी से नीचे गयी ताकि सोनल तक न पहुँच पाए ये आवाजे| नीचे पापा के दूर की बहन बैठी थी| आज ही उन्हें खबर मिली थी | पापा उन्हें बहूत मान देते थे| पैसे की तंगी थी पर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए आज तक| भाईदूज में जरुर आती और उसी समय पापा यथा सभंव उनकी मदद कर देते|
सौम्या के गले लग वे बेसाख्ता रो पड़ी| सौम्या ने ही आगे बढ़ उन्हें दिलासा दिया| सौम्या उन्हें बुआ ही कहती थी| बुआ बहूत ही स्नेहिल और ममतामय थी| उनकी खुद की कोई औलाद न थी| दूसरे बच्चो पर अथाह प्यार लुटाने वाली|
सौम्या को देख उनका मन कैसा कैसा तो हो गया|सौम्या शुरु से इन बुआ से बहूत घुल मिल गयी थी| जब भी आती सौम्या ही उन्हें स्नेहपूर्वक रोक लेती|जब बुआ थोड़ा सहज हूई तब सौम्या ने ही बात उठाई|" बुआ आप हमारे पास ही रह जाइए| हमें आपका बड़ा सहारा हो जाएगा| पापा ने हमेशा आपको अपने पास बुला कर रखना चाहा पर आपने हमेशा इंकार किया| पर आज आप मना मत करिएगा|"
बुआ को कुछ सुझा नहीं कि क्या कहे और क्या नहीं|पर आज बेटी ने पहली बार कुछ आग्रह किया हैं| इंकार करना भी ठीक नहीं होता|अतः बुआ तैयार हो गयी| सौम्या को असीम शांति मिली|
बुआ को सौम्या सोनल के साथ रहते आज दो महीने होने को आए|बुआ का ममतामयी मन सौम्या सोनल को काफी हद तक सहला गया था| सोनल अब व्यापार में रुचि लेने लगी थी| सौम्या को व्यापार में ज्यादा रुचि नहीं थी पर सोनल का भार कम करने का वो भरसक प्रयास करती थी|सौम्या ने एक स्थानीय कॉलेज में व्याख्याता के तौर पर पढ़ाना शुरु कर दिया हैं|
जब तब सौम्या सोनल टुटने लगती हैं बुआ संबल की तरह खड़ी हो जाती हैं उनके साथ| जीवन कभी किसी के लिए नहीं रुकता| खुद को मजबूत कर वक्त के साथ कदम बढ़ा लेना ही समझदारी हैं| जो साथ छोड़ गये वो कभी वापस लौट नहीं आएगे पर जीवन में हूए हादसो से उभर हालात से समझौता कर लेना ही सबसे बड़ी सीख हैं|
बुआ की ये सीख दोनो बहनो ने अपने जीवन में ढाल ली हैं|आ गयी हैं उनमें शक्ति जीवन को नयी नजर से देखने की|
इति
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