मेमसाहब की बेटी आज के जमाने की थी| प्रगतिशील और खुले दिमाग की| किसी दबे कुचले वर्ग की मजबूरी का फायदा उठा उसे शोषित करना उसे नहीं भाता था|शायद यही मकसद था कि वो इन्हीं पिछड़े वर्ग का
उद्धार करने के लिए ngo से जा जुड़ी थी|
सरवरी की बेबसी का अहसास उसे था और उसके लिए कुछ कर देना उसको जरुरी लगा बस सरवरी की तरफ से कुछ अच्छा संकेत मिले|और उसे आगे बढ़ना ही होगा| कब तक यूँ ही बधुंआ मजदूर बनी रहेगी|
उधर सरवरी को कमरा मिल जाने की राहत तो थी पर काम के जिस पहाड़ पर कल से उसे चढ़ना होगा उसे सोच कर भी उसे झुरझुरी चढ़ी थी| मेमसाहब को किस हद तक काम लेना आता हैं| ये इतने दिनो परख चुकी थी|
दूसरे दिन जब काम पर गयी तो मेमसाहब ने कामो की लंबी फेहरिस्त बना रखी थी| सरवरी ईमानदार थी सो उसके ऊपर पुरा घर छोड़ कर जाने से भी उन्हें कोई गुरेज न था|
मेमसाहब निश्चित हो निकल गयी|उनकी बेटी को किसी ऐसे ही अवसर की दरकार थी| उसने सरवरी को अपने पास बुला लिया| पहले मन तो टटोलु फिर देखु आगे क्या करना हैं|
सरवरी जब आ बैठी तो इस बात के अफसोस के साथ की उसे भी आज कुछ पढ़ना- लिखना आया होता तो आज इतना ओछा जीवन जीने को मजबूर न होती|
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