सारा समान ले जब सरवरी अपने आदमी के साथ मेमसाहब के यहाँ पहुँची तब शाम ढलने को थी| सरवरी को उसके आदमी और सामान के साथ देख सारा आकंडा भाप गयी|पर सरवरी के आगे अपने को ऊचाँ भी रखना था| इसलिए उसका मुँह जोहने लगी|सरवरी भी भाप तो चुकी थी कि मेमसाहब सब देख अनजान बन रही हैं| पर उसकी हैसियत नहीं थी उनसे कुछ कह पाने की और इस समय तो बिल्कुल नहीं जब उसे अपने ऊपर एक छत की सख्त जरुरत थी|
सरवरी ही आगे बढ़ मेमसाहब के पैर जा लगी| आदमी को भी ठेला आगे|
अपनी आपबीती सब सुना मेमसाहब से कमरे में रह लेने की मिन्नत करने लगी| ऐसा करना सरवरी को बिल्कुल न भा रहा था| अब तक उसने अपने स्वाभिमान को बिल्कुल नीचे गिरने न दिया था| आज तक यही तो उसकी जमा पूंजी थे|आज समय ने इतना नीचे ढकेल दिया|
मेमसाहब की अकड़ बनी थी|सरवरी ने हथियार डाल दिये|मेमसाहब तो अपनी गाथा गा रही थी कि उन्होने कितने लोगो को इंकार कर दिया उस कमरे के लिए| पर सरवरी की परेशानी देख वो उसको कमरा दे देगी| अपने तरफ से किए इस एहसान के बदले लंबी चौड़ी कामो की फेहरिस्त भी थमा दी| साथ में ये जोड़ दिया की अगर मजूंर हो तभी कमरे की चाबी पकड़ायी जाएगी|
कमरे की सख्त जरुरत थी सरवरी को| दोनो को हालातो का अंदाजा था|सरवरी का सिर हाँ में ही हिला| ये सारा माजरा मेमसाहब की बेटी अदंर बैठी देख रही थी| देख रही थी वो शोषित और शोषण करने वाले को| सारा माजरा समझ रही थी वो| मन में कुछ ठान भी लिया था उसने|
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