चौथी किस्त

उसका दिमाग एकदम काम नहीं कर रहा था| सदमे की अधिकता ज्यादा थी|अपनी आँखो के सामने अपना 'घर' तहस नहस होते देख उसका मन डुबने लगा|एकदम सड़क पर ही आ पड़ी थी अब वो|
    दोपहर ढलते झुमरु घर आया और सारा मंजर देखा तो सर थाम वही पसर गया|सरवरी ही मजबूत बनी उसकी ओर बढ़ी|झुमरु से बात करने की उसकी इच्छा मर चुकी थी| पर इस आपदा में और कोई सहारा भी तो न था|आगे का विचार भी करना था| अकेले कैसे निभा पाएगी?
   पर जिसका सहारा ले सरवरी आगे बढ़ने की सोच रही थी वो खुद एकदम कमजोर निकला|
' सरवरी अब का होई| कौनो जगह नाही जाई का| कौनो जुगत लगाई अब'|
     सरवरी का क्रोध ही बढ़ा ये सुन| अपनी मेहरारु पर हाथ उठाने में तो तनिक देरी नहीं होती अब यहाँ छोटा बच्चन की तरह सुबक रहे हैं|
   झुमरु की कातर आँखे सरवरी को ही देखे जा रही थी|
सरवरी ने जब जुगत लगायी तो मेमसाहब के अलावा कोई सहारा नजर न आया|उसकी मेमसाहब तो कब से इसी ताक में बैठी थी कि सरवरी को अपने पास रख हलक कर काम ले उससे| इस महानगर में रहने का ठिकाना मिले यही बहूत था| मेमसाहब के पास कई लोग आए इसी उम्मीद से मगर सरवरी की ईमानदारी उनके मन में बस गयी थी| इतने दिनो शहर रह कर भी शहर की हवा नहीं लगी थी उसे|
      कोई जुगत बनते न देख सरवरी मेमसाहब के घर की तरफ बढ़ ली|

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