इस नये मोड़ के लिए सरवरी बिल्कुल तैयार नहीं थी|सरवरी की खोली के बाहर पूरी बस्ती वाले आ जुटे थे|ये दिन आएगा इसका भान था बस्ती वालो को|पर इतनी जल्दी आएगा ये नहीं सोच पाए थे|
एक महीना पहले ही इस अनाधिकृत जमीन पर बनी बस्ती को तोड़ने के आदेश दिये जा चुके थे|मगर गरीबी से जुझ रहे ये बस्ती वाले और कौन सी जमीन में अपना घर टिकाते|चारो ओर से काली-पीली पन्नी को बांध अपनी लाज ढापने भर को अगर घर कहा जाता था तो वही खड़ा था इस बस्ती में ज्यादातर|कुछ पक्के मकान भी उभरे थे पर सबका अंजाम एक ही होना था|
कल के उगे काले निशान और दर्द से टुटते शरीर को समेट वो भी भीड़ का हिस्सा बन गयी|शायद कुछ उम्मीद निकल आए|नतीजा कुछ निकलता इससे पहले सरकार की तरफ से आए आदमी ने वक्त की पांबदी लगा सारे कयासो को पल भर में धुमिल कर दिया|ये बस्ती टुट ही जाएगी ये तय था|
सरवरी का दिमाग सुन्न था| उसकी रोजी-रोटी तो यही बंधी थी|इतनी जल्दी दूसरी जगह का इंतजाम कैसे कर पाएगी?
किसी दैत्य की तरह खड़ी के्न सबका दम रोके थी|पूरी बस्ती को नेस्तनाबूद करने का आदेश फिर दिया जा चुका था|
अब कोई भी चमत्कार होने का वक्त निकल चुका था| आदमी का सहारा भी नहीं था अभी|उसे कुछ सुझता न था|घर का सामान समेटे, सरकारी आदमी के हाथ पैर जोड़े या मेमसाहब का मुँह जोहे|
कुछ सोच उसने जल्दी जल्दी अपना सामान ही समेटना शुरु किया|मकान तो जाएगा मगर तिनका तिनका जोड़ ये जो गृहस्थी जमायी थी ये भी चली जाएगी तो उसके हिस्से कुछ नहीं आएगा|
शरीर साथ न दे रहा था फिर भी सारे बरतन -भाड़े, कपड़े -लत्ते सब समेट एक किनारे जा बैठी|
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