सातंवी किस्त

सरवरी अनमनी सी बैठी थी|इतने में मेमसाहब की बेटी आ गई|
  ' आपने बुलाया था मुझे|,सरवरी बोल उठी
हाँ, बुलाया था, अनु बोली| सब खो कर नया जीवन शुरु करना कैसा लग रहा हैं|शायद अच्छा क्योंकी तुम्हें आगे बढ़ने की इच्छा नहीं| गर कोई उंगली पकड़ कर भी आगे बढ़ाना चाहे तब भी तुम लोगो को उसमें स्वार्थ दिखेगा|जो मीठी बाते कर वकाई सब कुछ छीन कर ले गये उन लोगो पर आँख बंद करके विश्वास कर लेते हो|
    इतना कह अनु चुप हो गई| शायद सरवरी को वक्त दे रही थी कि वो अब तो अपने लिए कुछ बड़ा करने की हिम्मत जुटाए|
   सरवरी काफी देर चुप रही| इतना कि अनु को कहना पड़ा,' चलो तुमको अपनी जगह दबे कुचले रहना ही पंसद हैं तो वही सही|
   अनु सब समझ रही थी कि अभी कितना मानसिक आघात लगा हैं| इतनी जल्दी कैसे उभर सकेगी पर लोहा अभी गरम था चोट अभी न पड़ी तो कभी सिर न उठा पाएगी|उकसाना जरुरी था|
   अनु तो आये दिन ऐसे केस से दो-चार होती थी| चल देने को जैसे ही अनु आगे बढ़ी सरवरी की सुदृढ़ आवाज से उसके कदम रुक गये|
' बिटिया पढ़ना बहुत जरुरी होता हैं तो हम भी पढ़ाई करेगे| हमारे लिए अच्छा ही होगा| आपको देखते हैं तो मन बहुत खुश होता हैं| हम भी लिख पढ़ लेगे तो हमारा भी भला ही होगा हम तैयार हैं आपका कहा मानने को|'
   अनु को विश्वास तो था मगर सरवरी इतनी जल्दी मान जाएगी इसका भरोसा न था|सामने बोली ,' ठीक हैं, जब जागो तब सवेरा| कल से तुम्हारा नया जीवन शुरु होगा| भगवान चाहेगा तो तुम इतनी काबिल हो जाओगी कि औरो को पढ़ा पाओगी|तुम पर निर्भर करता हैं तुम कितनी जल्दी सीख पाओगी सब कुछ|'
   अनु चली गयी पर सरवरी देर तक अपने नये जीवन के ताने-बाने बुनती बैठी रही|

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