अंतिम किस्त

अगले दिन से सरवरी की जिदंगी का नया अध्याय शुरु हुआ| पढाई करने और जीवन जो अब तक जीती आई उससे अलग कुछ कर लेने का|पढ़ाई का वक्त उस समय का रहता जब मेमसाहब घर पर न होती और सरवरी घर का काम निपटा चुकी होती|परिस्थिती कठिन थी पर सकंल्प दृंढ था|
    सरवरी की ळमता क्या थी ये खुद उसे न पता था|सीखने की ललक ने उसे कम समय में इतना सीखा दिया की वो अपना नाम लिख लेना, हिसाब किताब करना और थोड़े अग्रेंजी के शब्द पढ़ बोल लेती| जब पहली बार उसने अपना नाम लिखा तो कितनी आत्मविभोर हो गयी| कितना आत्मविश्वास जाग गया खुद पर|
       पढ़ना चोचलेबाजी नहीं लगी अब जीने का साधन बनता भी लगा|वक्त अपनी चाल पर चलने लगा| आज एक साल होने को आए| सरवरी का जीवन बहुत बदल चुका हैं| अब वो मोहल्ले के बच्चो को प्राथमिक शिळा दे लेती हैं|जो उसका आमदनी का जरिया भी बन गया हैं| पैसे बहुत नहीं हैं पर आत्मसम्मान बहुत हैं| बचे वक्त में अनु की उसके कामो में मदद कर देती हैं| पैसा नहीं पर सीखने को बहुत कुछ मिलता हैं|
     मेमसाहब खासी नाराज हैं अपनी बिटिया से| उसी की मेहरबानी से हाथ आयी मुफ्त की बंधुआ मजदूर से हाथ धोना पड़ा|
     अगले साल से सरवरी ने अपनी जैसी दबी कुचली महिलाओ को पढ़ना लिखना सीखाने का बीड़ा उठाया हैं|उसकी राह आसान हो इस उम्मीद के साथ|
                          इति

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