सरवरी की नीदं देर से टुटी|हड़बड़ा कर उठ बैठी|दीवार घड़ी पर नजर खुद-ब-खुद घुम गयी|७ बज चुके थे|रात पति-पत्नी में जम कर ठनी थी|किस्सा रोज का ही था|पर कल रात झुम्मन ज्यादा चढ़ा कर आया था घर पर|सरवरी तो भरी बैठी थी निपटारा करने के लिए|
एक तो नशे में धुत और ऊपर से आदमी जात|सरवरी की बेलगाम होती जबान का नतीजा यही हुआ कि झुम्मन ने रुई की तरह धुन डाला सरवरी को|मार खा सरवरी देर रात गए दुख , अपमान और क्रोध की अधिकता से तनी बैठी रही|उसका पोर- पोर टीस रहा था| झुम्मन तो पीकर पड़ गया था एक तरफ|रात का बना खाना युँ ही पड़ा रहा| परसने की सुध भी नहीं हुई|ऐसे बेगैरत आदमी की क्या सुध लेनी?हाँ झुम्मन बैठे औरत की कमाई नहीं खाता था इतनी गैरत बची थी उसमें| नहीं तो इस बस्ती के ज्यादातर मरद औरत की कमाई पर ही जीते थे| और रात गए पी कर या तो नाली के किनारे मिलते या घर की देहरी लाघं घर की इज्जत के चीथड़े उड़ाते| जिसकी गुंज पूरी बस्ती सुनती|
झुम्मन सुबह सवेरे निकल पड़ता अपना कबाड़ की बोरी और साईकिल ले अपनी बोहनी करने| जिस दिन कमाई ज्यादा होती उस दिन झुम्मन की चांदी होती| अपनी कमाई फुंक आता दारु में|सरवरी की दोनो तरफ से मौत थी|ज्यादा खीज जाती तब उलझ पड़ती झुम्मन से|तब झुम्मन की मार के नीले निशान सारे शरीर पर छप जाते सरवरी के|
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Nice start...........
जवाब देंहटाएंMukul