अतिंम किस्त

शामली को आगे के लिए भी डॉक्टर की सख्त हिदायत हुई कि किसी तरह का कोई मानसिक सतांप नहीं लेना हैं| बीच-बीच में डॉक्टर को दिखा लेने की भी बात हुई| तब आकाश ने पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली| अच्छा लगा शामली को आकाश का ये थोड़ा सा अपनापन भी|
     शामली को अस्पताल से छुट्टी मिल चुकी थी| आज घर जाना था उसे|अनु का कही अता पता न था|आकाश समझ रहे थे शामली के मन की बात| पर इस बारे में न शामली ने कुछ पुछा और न आकाश ने कुछ कहा| शामली का मन बुझ गया| आकाश ने हौले से शामली को थाम लिया|बस और क्या चाहिए था|
     दोनो जब घर पहुँचे तो घर एकदम शांत था| शामली ने अपने मन को बहलाया शायद थक गयी होगी सोती होगी|इतने दिनो तक तो साथ बनी थी|
   आकाश ने आगे बढ़ कर घटीं बजायी| कोई हलचल नहीं|ऐसा भी क्या| उसके आने की अनु को खबर नहीं थी क्या?दरवाजा पल्लव ने ही खोला| शामली को सामने देख उत्साह से उछल पड़ा|एकदम चिपक गया शामली से|शामली ने भी सोचा कि न सही अनु पल्लव और आकाश हैं न| काफी हैं उसके लिए| पर एक टीस रही मन में कि इससे ज्यादा क्या होता उसके साथ जो अनु का निष्ठुर मन अभी भी न पिघला|
      घर एकदम अधेंरे में ही डुबा था| सारे परदे खीचें हुए|' कितना अधेंरा कर रखा हैं|' शामली के मुँह से जो ये निकला कि तभी सारी लॉइट एक साथ जल उठी|सामने अनु खड़ी थी हाथ में बड़ा सा बुके लिए हुए|साथ में खड़ा था पुरा परिवार और इस आड़े वक्त खड़े रहने वाले सारे पड़ोसी|शामली बस ठिठकी खड़ी रह गयी|आकाश को देखा तो वो मंद मंद मुस्कुरा रहे थे| आप भी?शामली कोमल मुस्कान लिए बोल उठी|
      सब ने समवेत स्वर में शामली का स्वागत किया|अनु आगे बढ़ चिपक गयी शामली से|ये वो पल था जिसकी शामली कल्पना करती थी|
' माँ , मुझे माफ कर दो| बहुत परेशान किया मैंने आपको|अब मैं वही पुरानी बेटी बन कर रहुगी आपके साथ|'
' मेरी बच्ची बस थोड़ा भटक गयी थीअब वापस राह पकड़ी हैं| अब सब ठीक ही होगा|'
    ऐसा कह शामली और अनु एक दूसरे के गले लग गयी| दोनो की आँखो से आँसु की अविरल धारा बह निकली जो बहा ले गयी सारे गिले शिकवे|
                           इति

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