सातंवी किस्त

आकाश के हाथो के तोते उड़ गये ये जान कर|डॉक्टर ने अॉपरेशन की बात कही|
  शामली को बीच बीच में तीखा सर दर्द होता था तो उसका यही कारण था| इस बात से आकाश बिल्कुल अंजान था|उसे एहसास हुआ कि किस कदर शामली की उपेळा हुई उससे| अनु के तो कहने ही क्या| उसे कभी लगाव था ही कहाँ| एक ही झटके में जिदंगी कहाँ से कहाँ आ गई|
    शामली के बिस्तर पर होने से सारा घर अस्त व्यस्त हो गया| कितना संभाल रखा था शामली ने सब कुछ|इस बात का एहसास बखुबी हो रहा था दोनो पापा बेटी को|पल्लव तो माँ के बिना वैसे भी कुछ बोल-सुन लेने लायक नहीं रह गया था|
       कुछ अच्छा होने को ही मानो ये मुसीबत आयी| शायद अनु को ही ये सीख देने की जिदंगी इतनी आसां नहीं जितनी उसने समझ ली थी|हालात ने बदल कर रख दिया अनु को| शामली को जैसे यकीन था कि उसके साथ कुछ बड़ा घटेगा तभी अनु सही राह पकड़ पाएगी|
   डॉक्टर की सख्त हिदायत थी कि शामली मानसिक तौर पर एकदम शांत रहे| आकाश और अनु को भी ये हिहायत थी कि कोई भी ऐसी बात जो सतांप का कारण हो शामली के आगे न की जाए|
    शामली का अॉपरेशन सफल रहा|उसके माँ- पापा ,भाई-भाभी सब पहुँ गये थे| परिवार क्या होता हैं और उसके होने से कितना आत्म बल मिलता हैं| अनु को आज समझ आया|अब तक मैं मेरे के घेरे में ही बधीं थी|

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