दूसरी किस्त

इतनी देर से उठने की वजह से सारे कामो का सिलसिला हाथो से फिसल गया| पानी भरने की लंबी कतार देख माथा भन्ना गया उसका|झुम्मन होता तो रात की थोड़ी कसर अभी पूरी कर लेती|दो-चार सुना अपने मन की भड़ास निकाल लेती|
    आज मालकिन की भी दो-चार सुननी होगी|शरीर पर पड़े निशान शायद मालकिन की थोड़ी बहुत सहानुभूति बटोर ले |पर मालकिन की सोच  से अच्छी तरह वाकिफ थी सरवरी| ' तेरा तो रोज का किस्सा हैं'ये कह मालकिन कई बार अपनी उपेञा दिखा चुकी हैं|उन्हें केवल काम से मतलब था जिसके वो पैसे देती थी| हाँ मालकिन की लड़की जो १८ बरस की थी और कोई ngo जैसी जगह काम करती थी उसका दुख दर्द बाटंती और खाली समय लिख पढ़ लेने पर जोर देती|सरवरी को उसकी बाते बेकार लगती|पढ़े लिखो के चोचंले लगते|
     इधर सरवरी का मन थोड़ा बदला था| पति से आए दिन पड़ने वाले लात-घुसों ने उसका शरीर और मन दोनो तोड़ दिया था|बगल में रहने वाली कजरी का पति तो कित्ता प्यार करता हैं अपनी औरत को|एक मुआ मेरा मरद ही ऐसा निकलना था|
   सरवरी उठ बैठी और देर करना ठीक नहीं होगा|सरवरी जब सुबह की रोटी थाप बाहर निकली तो मानो उसका दम ही निकल गया|सामने नगरपालिका की के्न खड़ी थी|

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