अनु शायद दूसरे दिन का इंतजार कर रही थी कि पापा आकर उसे मनाएगे पर आकाश ने इस बार कुछ कठोर हो जाने की ठान ली थी|अनु के कमरे का रुख न हुआ इस बार|
शामली का मन आकाश के इस एक बरताव भर से नहीं पिघलना था| घाव गहरा था वक्त लगना ही था|इतने दिनो का अपमान क्या एक दिन में उतर जाता?वो सारी घुटन,सारा खालीपन एक दिन का नहीं था|एक वो जिससे जिदंगी बांधी थी और एक वो जो उसकी पेट की जायी थी|उसका स्थान बना ही नहीं कहीं|शामली वैसी ही बनी रही संवेदनहीन|
अनु का आज का खाना भेंट चढ़ गया इस तनाव से| शायद कल का भी और उसके बाद का भी|उसके हाथ शामली को मानसिक रुप से परेशान करने का नया हथियार लगा था| जो काम आँसु न कर पाते वो काम ये करते|
इसके चलते अनु की चटोरी जीभ शामली के हाथ का बना लजीज खाना न मिल पाता पर शामली को परेशान देख उसे अजीब सुकून मिलता| माँ की ममता की परीळा लेना उसे कितना महंगा पड़ने वाला था इसका जरा अदांज नहीं था उसे|
मानसिक रुप से शोषित होती रही शामली की सेहत पर इसका गहरा असर पड़ा| एक दिन किचन में काम करते उसे जोर का चक्कर आया और वो वही किचन में गिर पड़ी|आकाश थे नहीं घर पर| पल्लव था और अनु भी|आवाज सुन पल्लव भागा आया मगर अनु पड़ी रही अपने बिस्तर पर|अकेला पल्लव क्या कर लेता सो उसे अनु को आवाज देनी पड़ी| स्थिती की गभींरता तब भी नहीं आंकी उसने| ढोंग कर रही होगी? यही विचार आया अनु के मन में|
एक बार देख ही आने की सोच जो अनु किचन में गयी तो माँ को औंधे मुँह जमीन में गिरे पाया| मुणह के ही बल गिरने से बड़ा सा गुमड़ निकल आया शामली के माथे पर| अब अनु को स्थिती की गभींरता का एहसास हुआ| ये देख उसके हाथ पैर ठड़े पड़ गये| इस हद तक सोच लेने का विचार नहीं था उसके मन में| पापा भी नहीं अब क्या करे वो? दिमाग सुन्न हो गया उसका|
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