जब आकाश वापस आए तो अनु एकबारकी पूरी बात बता देने को उतावली हो गई|उसने आकाश से पानी पुछ लेने की भी जहमत न उठाई|
छोटी थी अनु तो शामली ने ही सिखाया था कि जब कोई घर आए तो पहले पानी पूछ इत्मीनान से बैठने देना चाहिए|पर अब अनु को ये दकियानूसी बाते लगती थी| सो अभी भी आकाश के बैठते हीअनु अपना रोना रोने बैठ गयी|आकाश ने धीरे से कहा,' बेटा अभी थकान ज्यादा हैं| बाद में बात करते हैं|' लेकिन अनु पर एक बार माँ को पापा की डांट खिला देने का मन था| सो वो चुप नहीं बैठी|तब आकाश ने पहली बार शामली के लिए कुछ बोला,'माँ हैं तुम्हारी| तुम्हारी तरफ से ही जरुर कुछ हुआ होगा| तभी माँ ने किया ऐसा|'
अनु को यकीन न हुआ कि उसके पापा उससे इस तरह बात कर सकते हैं|
शामली की यही सोच बनी जो ये बात बहुत पहले हुई होती तो सारे रिश्तो को उनकी गरिमा मिलती| अब तो कच्ची मिट्टी पक कर आकार ले चुकी हैं| किसी और सांचे में ढालना मुश्किल होगा|
अनु तो बस दनदनाती अपने कमरे की तरफ हो ली| आदी जो नहीं थी पापा की तरफ से किसी भी ऐसी बात की| जाते जाते खा जाने वाली नजरो से उसने शामली को देखा| शामली ने परवाह नहीं की|पुराने तौर तरीको में ढली थी| अभी घर आए आकाश के सामने बात बढ़ाना ठीक नहीं लगा|उमर का कच्चापन हैं| शामली ने यही सोचा|
आकाश देख रहे थे शामली की ओर| आज शायद भीतर तक कुछ दरक गया| अभिमान या ग्लानि? उसकी तरफ से शामली की कि गयी अनदेखी| लेकिन शुरुआत हुई कुछ अच्छे की|
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