पल्लव सुखे में पानी की तरह उसके जख्मों को सहलाता|इतना शामली के लिए काफी था|
शामली ने झटक देना चाहा पुराने दिनो की कड़वी यादो को | पुराने दिन जैसे भी हो अच्छे ही लगते हैं ऐसी सोच उसे जमती नहीं थी| उखड़ आते थे बार बार यादो के गलियारो से उसे टीस देने को|
यही सब सोचते कब उसकी आँख लगी उसे पता न चला|पता चला तब जब किचन में बरतनो की उठा पटक सुनी|अनु जानबुझ कर बरतनो की आवाज कर रही थी|शामली की नींद तोड़ने और ये जताने की उसे भुख लगी हैं और किचन में खाने को कुछ नहीं|
शामली की नींद उखड़ गयी थी| तिस पर अनु की ये हरकत उसे बहुत नागवार गुजरी|क्या केवल खाना बनाने को बैठी हैं वो? जबान ही चलती हैं | कभी हाथ भी चला कर देख ले| चाय तक बना पाने की तमीज नहीं|उस पर गज भर लबीं जुबान|'
शामली थोड़ी देर तटस्थ बनी रही| फिर याद आया कि सुबह जो इतनी मुँह जोरी कर गयी तो खाना भी अंदर नहीं डाला|माँ की ममता ने जोर मारा| किचन में जा खाना बनाया मगर अनु को परस कर देना उससे न हो पाया| इतना हाथ पैर तो हिला ही सकती हैं|शामली निकल आयी किचन से|
अनु बुरा सा मुँह बनाए किचन में ही बनी रही| आज माँ का ये रुप नया था| पल्लव के आने पर शामली खाना निकालने किचन में गयी तो अनु जल उठी| अनदेखा शीत युध्द चल रहा था जिसमें शामली अपनी उमर की सारी समझाइश पीछे छोड़ अनु के साथ उसी की तरह उसकी हर हरकत का जवाब दे रही थी जैसे|
अनु ने मन बनाया की पापा के आने पर ये बात तो जरुर उठानी हैं| पापा का उसको पुरा साथ मिलना हैं| ऐसा यकीन था ही उसे|
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