दूसरी किस्त

आकाश बाहर गये हुए थे| ऊँचे ओहदे पर होने से अक्सर टूर पर रहना पड़ता था| तभी शायद बच्चो के प्रति ज्यादा उदारता बनी रहती|वैसे भी टूर से आने के बाद सब अच्छा ही बना हो ऐसी ही सोच बन आयी थी| तिस पर शामली का कुछ कह देना उसे ही कठघरे में ले जाता था|इसलिए शामली चुप सी बनी रहती|
    शामली का मन पीछे की जिदंगी की ओर मुड़ जाता| छोटी सी अनु कैसे उसके आगे पीछे चक्कर काटती| तब माँ का जरा बिछोह सहन न होता था उसे|माँ के साथ बनी रहने वाली अनु कब उससे छिटक बड़ी हो गयी उसे पता नहीं चला|
   अनु आकाश की भी लाड़ली थी|शुरु से ही आकाश ने उसका हर कहा मान लेने का जैसे मन बना लिया था| शामली की टोक आकाश लापरवाही से नंकार देते| शायद ऐसे ही किसी वक्त अनु का मन शामली के लिए विद्रोह से भर उठा होगा| अनु जब कुछ बड़ी हुई तो उसका कच्चा मन अपने पापा के बेहिसाब लाड़ के आगे झुकने लगा|शामली की गल्तियाँ अनु को बता बाप- बेटी खुब मजे लेते| टोकने पर ' मजाक कर रहा था' का जुमला उछाल देते|
   अनु को समझ आने लगी थी ये बाते| शायद वही से नींव पड़ गयी थी अनु का अपनी माँ की बातो की अवहेलना करने का सिलसिला|
   शामली निपट अनपढ़ , गवांर हो ऐसा  नहीं था| उसने इतिहास में पर- स्नातक किया था| और पढ़ाई कर लेने का सिलसिला जम नहीं पाया था| तब आकाश की सख्त हिदायत थी कि पहले घर और बच्चे फिर और कुछ|अब जिनके लिए सब बिसरा दिया वही उन्हें किसी गिनती में नहीं रखते|
   अपने कामो में हुई  गल्तियो को सुनते सुनते शामली भी उसी में ढल गयी या ढाल लिया उसने अपने को| उसे यही लगता कि उसे जैसे कभी कुछ करना न आया| उसका सारा स्वाभिमान मर चुका था|

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