शामली

अनु स्कुटी लगा बालो को लापरवाही से पीछे झटकती घर के मुख्य दरवाजे से अंदर आयी|
    खुले,लंबे बाल, छोटा सा टॉप और घुटनो से फटी जींस जिसे अनु फैशन कहती थी|
बैठकखाने में शामली बैठी थी अनु की मम्मी|अनु को देख राहत के भाव तिर आये थे शामली के चेहरे पर|अनु से कुछ भी पुछ लेना उन्हें नहीं भाया| आज सुबह ही माँ- बेटी में तीखी नोक-झोंक हो चुकी थी| अनु की जहर उगलती बातो ने अंदर तक उसका मन छलनी कर दिया था|
  आकाश अगर घर पर होते तो अनु वाणी का सयंम जरुर रखती|उनके हटते ही अनु की आवाज तेज हो जाती जिस पर शामली की आवाज दब जाती| उसकी बातो की बेअदबी करनअनु का रोज का शगल हो गया था|
अनु शामली को देख चुकी थी और चेहरे के भावो को भी पर इन सबको अनदेखा कर वो अपने कमरे की तरफ बढ़ गयी| उसका इतना रुखा व्यहवार शामली को चोट पहुँचाता था| शामली की बाते अपना महत्व खो चुकी थी अनु के लिए|
   शामली सोचने लगी कि जिस बेटी को हाथ पकड़ कर चलना सिखाया क्या अब उसका कद उससे भी ऊँचा हो गया?
    शायद अब इस घर में उसकी किसी को जरुरत नहीं| उसका बेटा पल्लव जरुर उसका साथ देने को हर वक्त खड़ा रहता| दीदी के माँ के प्रति रुखा व्यहवार उससे भी छुपा न था| हर लड़ाई के बाद वही आता माँ का साथ निभाने| आकाश तटस्थ रहते| शामली को ही चुप हो जाने की सीख मिलती| जब बात ज्यादा बढ़ती तब बचाव की मुद्रा में आ जाते|
  उनका यही व्यहवार अनु को शह देता|

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