आठंवी किस्त

नीलाभ का मन कैसा-कैसा तो हो आया| नीला रिश्तो को जोड़ कर रखने में कितनी आगे निकल गयी थी उससे और एक वो जो अपने को ही समेटने में लगा रहा| ग्लानि से भर उठा वो|उसका ठीक से पहुँच जाने का पुछना भी जरुरी न समझा उसने|
    नीला का हाल कहाँ अलग था उससे| रुठ कर मायके तो चली आयी पर नीलाभ को मन से न निकाल पायी|जब तब आ दस्तक दे ही जाता|
    दूसरे दिन नीलाभ ने फोन कर लेने का मन बना ही लिया|पहले तो अब तब के झुले में ही झुलता रहा देर तक| इतने में ही नीलाभ की सास का फोन आ गया|
    मम्मीजी का फोन,' नीलाभ का मन सशंय से भर उठा|नीला ठीक तो होगी?फिर क्या जान कर फोन नहीं किया उसने|
   जो नीलाभ ने फोन उठाया तो उधर से सासूजी का स्नेहिल स्वर गुंज उठा| ' दामादजी,कैसे हैं आप?' इस संबोधन का आदी न हुआ था नीलाभ अभी पर अच्छा लगा उसे सुन कर|नीलाभ बातो के बीच नीला को ही ढुढ़ता रहा पर संकोच से पुछना न हुआ|
     माँ ताड़ गयी आगे बढ़ फोन पर बात कराने को बोली|' नीला की मम्मी का फोन हैं कह सफाई सी दी नीलाभ ने|
' अरे! समधनजी, कभी हमें भी याद कर लिया करिए|वैसे आपकी बेटी को बहू के रुप में पा मैं तो निहाल हो गयी| कहाँ हैं लाड़ली मेरी?' प्यार से सराबोर था माँ का स्वर|
    उधर से क्या कहा गया की माँ चिंता में पड़ केवल अच्छा-अच्छा ही कहे जा रही थी| नीलाभ का मन ऊपर नीचे होने लगा| इधर माँ ने फोन रखा उधर नीलाभ ने प्रश्नो की झड़ी लगा दी| नीला की सोच जो हावी थी उस पर| माँ ने नीलाभ को आड़े हाथो लिया,'. क्यों रे नीलाभ परसो की गयी नीला का हाल लेना जरुरी नहीं लगा तुझे|घर ठीक पहुँची नहीं पहुँची जानना न हुआ तुझसे|'
   नीलाभ परेशान हो उठा ,' माँ नीला को करना चाहिए था न फोन|क्यों हूआ क्या?' मन का एक कोना नीला के बारे में जान लेने को तरस रहा था|
  जब ये जाना नीलाभ ने की नीला बाथरुम में  फिसल कर गिर गयी हैं| नीलाभ सारी शिकायते किनारे रख नीला से मिल लेने को उतावला हो उठा|
   माँ बोली ,'तू अभी होकर आ| मैं तेरे पापा के साथ थोड़ी देर में आती हूँ'| समय देना चाहती थी नीलाभ और नीला को|
  नीलाभ को तो जैसे कुछ सुझता न था बस पहुँच जाना चाहता था नीला के पास|
    नीलाभ को अपने सामने देख खिल उठा नीला का मुरझाया चेहरा|चहेरे के भाव न छिपा पायी नीला| नीलाभ भी कहाँ कर पाया कुछ ऐसा|
    ' सॉरी,'मुझे फोन करना चाहिए था तुम्हे|'नीलाभ बोल उठा|
  ' मैंने भी कहाँ खबर की?नीला ने कहा|कह मीठी मुस्कान फैल गयी नीला के चेहरे पर| नीलाभ को बहुत प्यारा लगा नीला का ये चेहरा|
' अब कैसी हो,' नीलाभ कह रहा था|
नीला ये दिखाने को कि वो एकदम ठीक हैं| उठ कर चल ही पड़ी पर नहीं सभांल पायी और गिर ही पड़ती जो नीलाभ संभाल नहीं लेता उसे|
  उसे सहारा दे बिस्तर में बिठा दिया उसने और उसके पास बैठ आखिर बोल ही तो दिया,' चलो इस सवेरे के उदास को अपने जीवन में भी भर ले हम| तुम्हारा घर तुम्हारा इंतजार कर रहा हैँ|
                                 इति

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top