सांतवी किस्त

उम्मीद के विपरीत नीलाभ ने रुक जाने का मन बनाया| पापा सेभी तो नहीं मिल पाया था अभी तक|
आज नीलाभ के कधो पर हर समय चढ़ा रहने वाला बैग भी नहीं था| जाने क्युं वो बैग जिसमें उसका कैमरा था साथ लाना उसे सुहाया नहीं|
    खाने का समय हो चला था| नीलाभ अपने कमरे में था| खाने की थाली परस ले आयी माँ उसके कमरे में| सबके साथ बैठ खाना खाना उसे पसंद कहाँ था|मगर आज माँ के हाथो में खाने की थाली देख शर्मिदां हो उठा नीलाभ| क्या-क्या नाटक करता था वो भी|माँ को लगा उसका नीलाभ वापस आ गया हो|
   खाने की मेज पर पापा बैठे थे| आकर नीलाभ गले ही लग गया अपने पापा के| पापा को यकीन न हुआ कि ये उनका अपना नीलाभ हैं|
' बहू कहाँ हैं'? नीलाभ से पहले माँ बोल उठी' अपने मायके गयी हैं'|
' बहू तो बड़े संस्कारो वाली हैं रे नीलाभ| जब यहाँ आती हैं माहौल बना जाती हैं| पर तुम दोनो के बीच कोई समझौता हुआ हैं कि दोनो में से एक ही आएगा|' कह पापा तो हंस दीये|
   ' नीला आयी थी यहाँ? कब?'
' कई बार  पता नहीं तुझे?'पापा बोले|
' नहीं' धीरे से बोला नीलाभ|
उसे याद आया नीला ने कितनी तो बार नीलाभ से चलने को कहा था पर वो निर्मोही कभी हाँ न कह पाया था|
    

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