छठी किस्त

अगले दिन सुबह नीला तैयार हो गयी जाने के लिए| नीलाभ का चेहरा वैसा ही उतरा रहा| नीला ने सोचा जो इतनी तड़प है तो कह क्यों नहीं देते रुकने को| पर नीलाभ वैसा ही मूक बना रहा| कुछ बोल नहीं निकले|
     नीला चली गयी साथ ले गयी  नीलाभ का सूकुन-चैन| नीलाभ का लगा जैसे कुछ खो गया उससे| रीतापन सा फैल गया आस-पास| स्टुडियो में जाने का मन नहीं किया उसे| पिछले कुछ दिनो से शायद नीला को जलाने के लिए  ही स्टुडियो में व्यस्त होने का दिखावा करता था| आज जब नीला चली गयी तो किसके लिए का भाव तिर आया नीलाभ के मन में|
   रामू ने आकर खाना पूछा मगर उसका मन उचटा ही रहा| रामू ने रसोई बढ़ा दी और खाना फ्रिज में रख चला गया|
   रामू भी चला गया तो खाली घर काटने को दौड़ने लगा| आज इतने दिनो बाद उसे अपने घर की बेतरह याद आयी| कैसा निर्मोही हुआ है वो| कितना स्नेह लुटा दिया पर वो दो मीठे बोल न  दे पाया| आज जो लुटा-पिटा सा खड़ा है अकेला तो सब उसकी अपनी करनी थी| बाजार जा ढेर सा सामान बटोर चल पड़ा घर की ओर|आज जाने क्या मन बना उसका नहीं तो इतने सालो सबके साथ रह कर भी अलग- थलग सा ही बना था वो|क्या नीला का साथ ये असर दिखा गया?
   माँ ने नीलाभ को सामने पाया तो निहाल हो गयी इतने दिनो की शिकवा-शिकायत दरकिनार हो गयी|
  ' क्यों रे आज याद आयी अपनी माँ की|बहू कहाँ हैं? मीठी झिड़की दी माँ ने|
  ' मायके गयी हैं| थोड़े में कह जान छुड़ा लेनी चाही नीलाभ ने|
   ' ओह तभी न कहूं इधर का रास्ता कैसे भूला मेरा बेटा' माँ मीठी हसीं हंस दी|
   अपने साथ लाया सामान माँ को पकड़ा दिया| पहली बार किया ये सब| जाने कैसा हो| उसमें आए परिवर्तन के भापं रही थी माँ| बेटा उस राह पर चल निकला था जिसकी उम्मीद छोड. ही चुकी थी माँ|
रात माँ ने नीलाभ ने रोक लिया नीलाभ को|
' क्या करेगा खाली घर में जाकर|नीला भी नहीं है| रात यही रुक जा| ' माँ ने कहा|
आज पहली बार लगा की अब वो शादी- शुदा हैं और नीला उस की जिम्मेदारी हैं|

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