पाचंवी किस्त

अगले दिन नीला कुछ जल्दी घर से निकली| नीलाभ को नहीं रामू को कह कर की दरवाजा बंद कर ले|
   नीलाभ जब शाम को अपने काम से वापस आया तो कैमरा उसके हाथ में था|कुछ खोया पा लेने का भाव चस्पा था उसके चेहरे पर| पर कमरे में आते वहाँ लगा A.C मानो उसका मुँह चिढ़ा रहे हो| कैमरे को लेने की सारी खुशी हवा में उड़ गयी|
  नीलाभ का पुरुष मन आहत हो उठा|' ये कैसे?'
इतना ही निकल पाया उसके मुँह से|' मुझे बता देना भी जरुरी नहीं समझा तुमने'|ठहरी सी आवाज में कहा नीलाभ ने कहा|
  नीला का अब तक का अभिमान, कुछ दिखा देने की जिद सब भरभरा कर गिर पड़े|उसे लगा शायद थोड़ी जल्दबाजी दिखा गई| गर्मी कहाँ शुरु हूई हो पाई थी पूरी तरह से अभी|
   सामने तो यही बोल पायी'थे पैसे तो ले आयी'|
नीलाभ को खल गयी ये बात कहीं गहरे तक|उस दिन के बाद से अबोला ही बना रहा|
   नीला उकता उठी ऐसे माहौल से| इतना मान किस बात का| यही तक सोच पायी नीला| इसके चलते अपने मायके जाने का मन बना लिया नीला ने|शादी के बाद चौथी की रस्म भी कहाँ हो पायी थी|नीलाभ के साथ यहाँ जो आ बसी थी|मायके का पैर फेरना अब तक नहीं हो पाया था| माँ इसरार ही करती रह गयी थी|
  शाम को जब नीलाभ कमरे में आया तो नीला ने कह ही दिया' कल माँ के पास हो आँऊ सोच रही हूँ| शादी के बाद जाना हुआ नहीं|आप भी चले तो अच्छा होगा|'
     कहने को तो नीला कह गयी पर सोच यही रही थी कि न जाए तो ही ठीक| ऐसा लटका मुँह ले कर जाने का फायदा क्या|
   नीलाभ भरा बैठा ही था ' आपकी मरजी| वैसे भी आप इतनी समझदार हैं कि सारे फैसले अकेले ले सकती हैं'|
    नीलाभ का ये कहना अखर गया नीला को|बात को कितना तो तुल दे दिया| अभी यही सोचे थी कि जो नीलाभ एक बार भी न जाने का जोर देगा तो रुक जाएगी खुशी  से| मगर बात मान अभिमान के बीच आ अटकी थी इतनी जल्दी कहाँ पार था इससे|
  नीला ने ठान लिया कि कल वो चली जाएगी| अकेले रहे तो मुझे क्या वाले भाव तिर आये उसके चेहरे पर|
  सामान लगाने बैठ गयी| जिद सी हो आयी नीला को|नीलाभ उचटा सा बैठा रहा| जितनी देर नीला सामान लगाती रही जाने कितने चक्कर लगा लिए नीलाभ ने अपने स्टुडियो और कमरे के बीच| शायद नीला मन पलटा हो|
    रात नीलाभ की स्टुडियो में ही कटी|

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