नीला भी खुल रही थी नीलाभ के साथ|' चलो रामू के न आने का ये तो बढ़िया नतीजा निकला|' सोचा नीला ने|
पहली रसोई की थी नीला ने| गर ससूराल में होती तो शगुन जरुर मिलता|ससुराल के सब अच्छे लगे उसे| पर नीलाभ का ही तालमेल नहीं बैठा|
मन से खाना बनाया गया तो लाजमी था बढ़िया ही बना होगा| हूनर था नीला के हाथ में| नीलाभ उगलियाँ चाटता रह गया| ' काश रोज मिल पाता ऐसा खाना|'पहली बार माँ की बरबस याद हो आई|
' कोई नहीं सारी तैयारी हो तो खाना बनाने में देर कितनी लगती हैं| रोज ही मिल जाएगा|' शरारती हंसी तैर आयी नीला के होठों पर|
उस दिन के बाद से दोनो का जीवन काफी हद तक बदल गया|नीला नीलाभ की पसंद नापसंद जानने लगी तो नीलाभ को शाम ढलते नीला के दफ्तर से आने का इंतजार रहने लगा|शाम की चाय एक साथ पीने लगे दोनो| चाय के साथ बातो का नाश्ता भी मिल जाता|जिससे मन और आत्मा दोनो तृप्त होने लगे| अब दो बेडरुम का वो घर घर की तरह लगने लगा|
इधर नीला ने महसूस किया कि जब सुबह उसकी आँख खुलती तो नीलाभ को एकटक अपनी ओर निहारता पाती|उसे जागा देख तुरंत करवट बदल लेता|नीला निहाल हो जाती नीलाभ का ये रुप देख कर|
गर्मी शुरु हो चुकी थी| जो एक A.C लगा था वो नीलाभ के स्टुडियो में| तय हूआ कि आने वाले रविवार को यही काम निपटाया जाएगा|
रविवार आने में दो दिन की समय था|उस दिन घर में दाखिल होते ही नीलाभ ने मानो ऐलान सा किया|' जो कैमरा इतने दिनो से लेना चाह रहा था अब बाजार में आ गया हैं| अब किसी भी तरह उसे वो कैमरा खरीदना ही होगा|'
' कितने तक का होगा कैमरा?'नीला ने पुछा|
'६०,००० का तो होगा ही' नीलाभ बोला|
इतना महंगा," नीला चिहूंक उठी|फिर A.C कैसे आ पाएगा?
बाद में आ जाएगा," नीलाभ लापरवाही से बोला|
चिढ़ उठी उसकी बात से नीला| यही बात ढंग से कह देता नीलाभ तो उसे इतना अखरता नहीं|
नीला रुठी सी जा बैठी अपने बिस्तर पर|नीलाभ को कोई फर्क पड़ा हो ऐसा लगा नहीं| अपने स्टुडियो में जा व्यस्त हो गया| उसकी ये बेरुखी अदंर तक साल गयी नीला को|
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