नीला चाय बना लायी|चाय का लामान ढुढ़ने में खासी दिक्कत हूई उसे|नीलाभ ने नीला को चाय लाते देखा तो हड़बड़ा कर उठ बैठा
' रामू कहाँ हैं?इतना ही कह सका|मगर का एक कोना चहक उठा हो जैसे|
' आया नहीं अभी तक| तबीयत खराब थी कल से'नीला ने इतना बता देना जरुरी समझा|
नीलाभ बिना नीला का इंतजार किए चाय की चुसकी भरने लगा था|' वाह क्या चाय बनी हैं| मजा आ गया'
नीलाभ की फक्कड़़ तबीयत से वाकिफ थी नीला इसलिए नीलाभ की तारीफ नीला को सुखद लगी|
चाय के बाद खाना बनाने की बात आयी| इतने अस्त-व्यस्त किचन में खाना न बना पाएगी वो|शायद नीला का मन पढ़ लिया था नीलाभ ने|इतने दिनो से देख तो रहा था नीला के रहने का तौर तरीका|
पहल नीलाभ ने ही की'खाना पास की कैंटीन से मगवां लेते है| साफ घर जैसा खाना मिलता हैं|'
नीला ने हामी भर दी|
फोन पर जल्दी से नीलाभ ने खाने का बोल दिया| नीला को समय पर दफ्तर पहुचँना होगा ऐसा कुछ सोच कर|नीला को भा गयी नीलाभ की इतनी फ्रिक करना|
अभी का हो जाए शाम का मैं देख लूंगी,'कहा नीला ने|
शाम को नीला आयी तो काफी थकी थी| थोड़ा आराम करवो किचन में घुस गयी|किचन का हाल देख सर ही चकरा गया उसका|कौन सा सिरा पकड़े यही न सोच पायी काफी देर तक|एक दिन का काम तो था भी नहीं|जो अभी सफाई लेने बैठेगी तो खाना बना नहीं पाएगी|रामू आज होता सामने तो शामत थी उसकी| नीला को अपने पर भी गुस्सा आया जो इतने दिनो तक रसोई में झांकना जरुरी नहीं समझा|
रसोई में होती खटर पटर नीलाभ को रसोई तक खींच लायी थी| नीला को किचन में जुझते देख तरस हो आया| तरस इसलिए कि वो अभी भी नीला को मेहमान से अधिक का दरजा नहीं दे पाया था|
' आप रहने दीजिए|दफ्तर से आकर थक गयी होगी| बाहर से मगंवा लेते है न खाना|' संकोच से भर उठा नीलाभ मानो किसी मेहमान से बात कर रहा हो|
बना लूंगी मैं सब बस ये सामान लेते आइए बाजार से' कहते नीला ने अधिकार से एक लिस्ट पकड़ा दी नीलाभ को|
बेहिचक होती ये बाते नीलाभ को सहज बनाती जा रही थी|
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