दो बेडरूम के फ्लैट में एक कमरा तो तकरीबन खाली था|उसके आने से पहले नीलाभ का एक कमरे से ही काम चल रहा था| सोना खाना सब एक ही कमरे में हो रहा था उसका|शादी के बाद जो एक बदलाव हुआ वो ये कि नीलाभ का बिस्तर नीला के बिस्तर के बगल में लगने लगा| फासले से|
नीलाभ था अस्त व्यसत सा रहने वाला पर नीला सलीके से रहने वाली लड़की थी|
दिल जो बटां था तो कमरे भी बटं गये| दोनो के हिस्सो की जिदंगी शुरु हो ही गयी थी|नीलाभ अकेला रहने वाला इंसान उसे कभी नीला का होना अखरता कभी अच्छा सा महसूस होता कि कोई है उसके साथ उसका रुम शेयर करने वाला उसका रुम-मेट|
नीला को भी भा गई थी ऐसी जिदंगी|सास-ननद का कोई टेशंन नहीं और पति का होना न होना बराबर|खाना और घर के काम के लिए जो नौकर था नीलाभ के लिए वो दोनो का ही काम कर जाता| उसको दोनो के बीच का अतंर कहाँ समझ आता| मायके से ज्यादा नीला आजादी यहाँ मना रही थी|
शुरु में सब वैसा ही चलता रहा जैसा दोनो चलाना चाहते थे| अलग-अलग क्योकीं दोनो ने अपने दायरे खुद तय कर रखे थे|मगर इस एकसार जीवन के चलते नीला जल्दी उबने लगी| उसे लगता कि वो अपने दिन भर की बातो का पिटारा खोले किसी के सामने|कुछ अपनी कहे कुछ उसकी सुने| मान-मनौवल का दौर चले|
उधर नीलाभ की झिझक बरकरार थी| ज्यादा नहीं खुल पाया था वो नीला से| बस चलते फिरते दो चार बाते हो जाती|मगर अभी उसे अपने तरीके की जिदंगी जीना ही आसान लगता था| आदते क्या इतनी आसान होती है बदलना|
एक दिन नीला सुबह उठ कर चाय का पानी चढ़ा रही थी| नौकर नहीं आया था अभी| उसकी तबीयत कल से थोड़ी ढीली थी| शायद आज न आ पाये|
नौकर के हाथो में अब तक रसोई थी| कोई देखने टोकने वाला नहीं सो बुरा हाल था| नीला का मन हो गया की आज शाम पहला काम वो यही करेगी रसोई को ठीक ठाक करने का| नीलाभ ने रसोई की खटर पटर सुन यही सोचा की नौकर आ गया है सो चाय बनाने के लिए आवाज दी
कहाँ रह गया था इतनी देर | चाय बना दे एक कप बढ़ी तलब लग रही हैं|
नीला मुस्कुरा दी और एक कप चाय का पानी और बढ़ा दिया|शायद एक बदलाव का पहला कदम|
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