यह कहानी दो मुख्य पात्र के ईद-गिर्द घुमती है|
भीड़ बहुत ज्यादा थी| मेहमानो का आना जारी था|ऐसी भीड़ होनी लाजमी थी| मूलचंद जो शहर के जाने - माने व्यवसायी थे उनके इकलौते साहबजादे की शादी का मौका था ये|साहबजादे इस मायने में की अपनी मरजी के मालिक थे| इस शादी के लिए भी बहुत दवाब के चलते हाँ की थी|इसरार तो बहुत किया की ज्यादा ताम-झाम न कीजिएगा| मगर शादी का मौका और जो इतना नाम था मूलचंदजी का शहर में तो सोच नहीं पाये कि किसको रखे किसको छोड़े|
खुशी से सबके चेहरे दमक रहे थे|सिवाय नीलाभ के| नीलाभ मूलचंद का इकलौता बेटा|नीलाभ की दुलहन नीला गजब ढा रही थी शादी के लाल जोड़े में|इससे भी नीलाभ बहुत खुश हो ऐसा दीख नहीं पड़ रहा था| नीला भी समान्य बनी थी| उसे शादी का बहुत उत्साह हो ऐसा दिखा देने में भी उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी|
चुहलबाजी का दौर चल रहा था दोनो ओर से| मगर नीलाभ मौन व्रत लिए बैठा रहा| नीला सोच रही थी' कैसे बागूंर के साथ बंध रही हूँ|' मगर वो भी कौन सी उत्साहित थी शादी के लिए|
शादी निपट गयी और वो अंतहीन रीती-रिवाज भी| कम से कम नीलाभ को यही लगा|मस्तमौला तबीयत का था| अपने खुद का फोटोग्राफी स्टुडियो था| पापा के काम में कोई दिलचस्पी न थी| नीला का रुझान पढ़ाई की तरफ था| वो सरकारी नौकरी में अच्छे ओहदे पर थी|
नीलाभ ने अपनी कोठी से अलग एक फ्लैट ले रखा था| शादी के बाद भी सबकी जिद को दरकिनार कर उसी में रहने का मन बना लिया था|नया जीवन तो शुरु हो गया था नीलाभ का पर तौर तरीके वही पुराने|
दोनो के बीच अनकहा समझौता हो गया किदोनो बस अपने काम से काम रखेगे और दोनो एक दूसरे के जीवन में कोई दखल नहीं देगे|
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