पहली किस्त

                           पलक
  
स्कुल का पहला दिन था| सहमी सी बैठी थी पलक|छोटी सी तो उमर थी उसकी|महज चार बरस| उसे अपना पुराना स्कुल याद आता रहा|
बाप रे बाप! इतना बड़ा स्कुल| इस स्कुल में तो वो क्लास के बाहर भी नहीं जाएगी कहीं खो गई तो| पहले playschool में छोटे से कमरे में ही क्लास लग जाया करती थी| मजे मजे में a,b,c,d सीखती,सबके साथ खाना खाती और हल्का फुल्का बैग लेकर घर आ जाती| रोज मजेदार outing  की तरह|
   अब तो वो एक नामी स्कुल में दाखिला पा चुकी हैं|पहली क्लास में |सारे बच्चे नये,नये टीचर| दोपहर का खाना भी अकेले बैठ कर खाया| कोई दोस्त ही नहीं उसका| lunch time में जो नजर घुमायी तो क्लास के आखिर में एक लड़की बैठी मिली उसे| अपना टिफिन का खाना कुतर ही रही थी जैसे उसे पसंद न हो|
पलक ने सोचा उसकी मम्मी को आज तो उसे अच्छा खाना देना था न| first day हैं आज तो| उसकी मम्मी ने उसके मनपसंद खाना दिया है| आलू की सब्जी और पूरी| मनपंसद नाश्ते ने उसका मूड ठीक कर दिया|उसे मम्मी की याद आयी| जल्दी छुट्टी हो और वो  भाग अपनी मम्मी के पास चली जाए| उसकी मम्मी तो world की बेस्ट मम्मी हैं|
दो दिन पलक उस लड़की को देखती रही शायद अपना सर उठा कर मुझे देख ले पर वो तो अपने टिफिन में ही जाने क्या खोजती रहती थी| तीसरे दिन पलक से न रहा गया| उसे भी तो एक दोस्त की जरुरत हैं|उसे खराब भी लगता उसे रोज डबलरोटी और बिस्कुट खाते देख| पलक पहुँच गयी उस लड़की के पास| जो कुछ समझ न आया तो,'तुम्हारा नाम क्या हैं?' यही पुछ लिया| पहली बार उसने मुँह उठा पलक को देखा| अरे! ये तो कितनी सुदंर हैं|' कविता हैं मेरा नाम, उसने कहा| ' मुझसे दोस्ती करोगी' पलक ने कहा| ' यहाँ मेरा कोई frd नहीं एक भी नहीं| जवाब में कविता का हाँ में सर हिल गया| धीरे से कविता बोली तुम्हारा क्या नाम हैं| ' पलक' कह पलक ने कविता के टिफिन को देखा| हल्का मक्खन लगी दो डबलरोटी के टुकड़े और बिस्कुट| तुम्हे और भुख नहीं लगती मेरी मम्मी तो कितना खाना देती हैं| कह पलक भाग कर अपना टिफिन ले आयी| उसके टिफिन पर पलक की नजर माने जम सी गयी| हम दोनो share कर लेगे| कल से मम्मी से और खाना रखवा कर ले आऊगीं| पलक ने कहा तो पहली बार उसने कविता के चेहरे पर मुस्कान देखी| बहुत सुदंर हैं| पलक ने सोचा| दोस्ती की नीवं पड़ चुकी थी|

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