वातावरण बोझिल सा हो उठा|राहूल को वहाँ और रूकना ठीक नहीं लगा|दीपा बोल उठी' गल्ती आप की नहीं एक अकेली औरत सौ सवालो को जन्म दे ही देती है|'ऐसा कहते दीपा का स्वर एकदम टूटता सा लगा|
राहूल के चले जाने के बाद दीपा खिड़की के पास खड़ी देर तक शुन्य में ताकती रही|संवेदनहीनता से भरी| अशुं ने पास आकर धीरे से उसे छुआ|दोनो की नजरे मिली|अशुं जैसे अपनी माँ की आँखो का सारा दर्द अपने में समेट लेना चाहती थी|दोनो देर तक यूँ ही खड़े रहे एक दूसरे को थामे|एक दूसरे में सहारा ढुढ़ रहे हो जैसे|
अगली सुबह दीपा की आँखे देर से खुली|हड़बड़ा के उठी वो ये सोचते की आज स्कुल के लिए देर हो जाएगी|फिर अचानक याद आया कि आज तो रविवार है|फिर ढलक गयी वो बिस्तर में|दीपा रात देर तक जागती रही थी जीवन के ताने-बाने बुनती|
राहूल का आना नहीं हो पाया दो-तीन दिन तक|या तो वो बहूत संजीदा हो गया या फिर उसे कुछ काम हो सोचा दीपा ने|उस दिन राहूल का यूँ चला जाना दीपा को कचोट रहा था|
उस दिन शाम को दोनो बाजार निकले तो राहूल से मुलाकात हो गयी|राहूल बच कर निकल जाना चाहता हो जैसे|उसके सामने होने से दीपा के सोये घाव फिर से हरे न हो जाए| पर अशुं का बालमन पिछली बाते भूल ही चुका हो जैसे|वो राहूल से उसी तरह चहकते हूए मिली|अशुं का ये सहज व्यवहार दोनो के शब्दो को मानो जबान दे गया|
उस दिन की कोई बात नहीं उठी|एक दूसरे का हाल चाल ही लिया बस|अशुं ही बोल उठी 'सर अब आप मुझे चिञ सीखाने भी नहीं आते'.
राहूल ने हसं कर दीपा की ओर देखा मानो घर आने की इजाजत मागँ रहा हो|दीपा ने हाँ में सर हिलाया| फिर मानो सब पहले सा सहज हो गया|
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