राहूल का दीपा के यहाँ जो आना-जाना शुरु हुआ तो इस बार बात अलग थी| राहूल के अदंर जो हिचकिचाहट थी वो जाती रही थी| उसकी जगह जिम्मेदारी ने ले ली|ऐसा लगा दीपा को|बोझिल वातावरण खुला और सहज हो गया|दीपा की हिचकिचाहट जो राहूल के आते बन जाती थी जाती रही|
राहूल का व्यवहार दोस्ताना था और हाजिरजवाबी में भी माहिर|पर दीपा सजग थी एक बार चोट खा चुकी थी दूसरा घाव नहीं दे सकती अपने को|
उस दिन रविवार था|तीनो का पिकनिक का कार्यक्रम बन गया| वैसे भी घर से स्कुल और स्कुल से घर इसके अलावा दीपा और अशुं की कोई जिदंगी नहीं थी|एकसार जीवन जीना कितना ऊबाऊ हो जाता है कभी-कभी|
दीपा खुश थी क्योंकी अशुं खुश थी|पिकनिक में सवेरे के निकले शाम ढले तीनो घर पहुचेँ|अशुं निढाल थी नीदं से|घर आते ही अशुं बढ़ गयी घर की तरफ|जो दीपा भी बढ़ने लगी राहूल ने दीपा का हाथ पकड़ लिया हौले से|
'मुझे कुछ कहना है आपसे' राहूलने कहा|
दीपा को अहसास हो जैसे इस बात का| अक्सर उसने राहूल को एकटक अपनी तरफ देखते हुए पाया था| उन नजरो में कोमलता थी चाहत थी उसके लिए|
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