पाचंवी किस्त

इस प्रदर्शनी को सफल बनाने में राहूल ने बहूत मेहनत की थी|उसकी मेहनत दीख रही थी|काम करने का उसका तरीका अनोखा था|जिन बच्चो के चिञो को प्रदर्शनी में जगह मिली थी उन्हे और उनके अभिभावको को राहूल बराबर से हिस्सा लेने को प्रोत्साहित कर रहा था|इससे राहूल का काम भी आसान हुआ और अभिभावको की तरफ से भी उत्साहजनक परिणाम मिले|
      अशुं के दो चिञो को इस प्रदर्शनी में जगह मिली थी|अशुं का उत्साह देखते बनता था|दीपा को भी इस सिलसिले में कई बार जाना पड़ता था हॉल में जहाँ ये प्रदर्शनी लगी थी|जाहिर सी बात थी दोनो के बीच बातचीत भी चलती|
       राहूल की सहजता के कारण वो दीवार जो दीपा ने अब तक खड़ी कर रखी थी दरकने लगी|
          प्रदर्शनी को अपार सफलता मिली| जाने क्यों दीपा को अदंर तक खुशी दे गयी ये बात|
           राहूल ने अशुं से वायदा किया था कि काम खत्म होने पर वो अशुं को चिञ बनाना सिखाएगा|सो अब राहूल का अक्सर जाना होने लगा दीपा के यहाँ|एक दिन युँ ही बातो बातो में राहूल ने पुछ ही तो लिया अशुं से उसके पापा के बारे में|दीपा कुछ बोलती उससे पहले ही अशुं बोल उठी'नहीं रहते पापा हमारे साथ'|उसका स्वर राहूल को अदंर तक बीधं गया|अशुं की भीगी आखें बहूत कुछ कह गयी| दीपा का चेहरे में दर्द की तमाम रेखाएं फैल गयी|
        घर की सूनी दीवारे बहूत कुछ कह उठी|राहूल ने तय किया की अबसे वो कभी इस बात को नहीं उठाएगा|
     

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