दीपा असहज हो उठी|स्कुल में देर हो जाने की बात कह वो अशुं का हाथ पकड़ जल्दी आगे बढ़ चली|औपचारिकता निभाना उससे हो नहीं पाया|
दिन हफ्तो फिर महीनो में ढलने लगे|अशुं और दीपा स्कुल में सहज हो गये और घर भी सुकून देने लगा|बस कभी बयार सी आती पुरानी यादो की मगर कुछ समेट नही पाती बस छु कर निकल जाती|
उस दिन के बाद से उस नौजवान से दीपा की अकसर आमना सामना हो जाता|राहूल था उसका नाम|उसी स्कुल के कला विभाग में कायर्रत|ये महज इतफाक ही था|उस दिन भी राहूल अशुं का स्कुल युनीफार्म देख यही कुछ पुछना चाहता था मगर दीपा ने ये मौका नहीं दिया उसे|
स्कुल में हर बच्चे को खेल या किसी एक कला में भाग लेना अनिवार्य था|अशुं को चिञ कला का बेहद शौक था|दीपा का पुराना घर अशुं के अनगढ़ हाथो से बनाए कितने ही चिञो से अटा पड़ा था|इस नये घर की कोई दीवार अशुं के बनाए चिञो को नही समेट पाया|अशुं समझती हो जैसे उसने कभी जिद भी नहीं की पर स्कुल ने मानो नये पखं दे दिये हो उसे उड़ने के लिए|
इन्हीं सब की वजह से अशुं राहूल से जल्दी ही घुल मिल गयी|उसका बालमन अभी अपने परायो की सीमा को कहाँ पहचान पाया था| फिर राहूल था भी ऐसा की हर कोई उसके साथ सहज हो उठता|
स्कुल की वाषिर्क चिञ प्रदर्शनी की तैयारी चल रही थी|अशुं उत्साह से भरी थी|राहूल पर सारी जिम्मेदारी आ पड़ी|
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