शाम सरकने लगी रात की तरफ|दीपा को मानो समय का अहसास ही नहीं रहा|गोधूली बीत गयी|दीया -बाती करने की भी सुध बिसर गयी जैसे|अधेंरा अपने आप में सब समेटने लगा जैसे|नौकरानी ने आ कर आवाज दी तब दीपा की चेतना लौटी जैसे|
क्यो असमय खोल लेती है बीती यादो को|क्या मिलता हैं ऐसा करने से उसे सिवाय एक टीस के जो रीसती रहती है हर वक्त|
उखाड़ फेकेगी वो पुरानी यादो को| नही तो दीमक की तरह चाट लेगी उसको और अशुं को|अपने लिए न सही अशुं के लिए करेगी जीवन की नये सिरे से शुरुआत|
दूसरे दिन की सुबह रोज की तरह नही थी|एक अलग सवेरा ले कर आयी थी दोनो के लिए| आज दोनो के स्कुल का पहला दिन था|अशुं बहूत खुश थी स्कुल ही सही आज वो घर से पहली बार निकली थी|
मानो वो उड़ ही जाना चाहती थी|दीपा का हाथ छुूड़ा तेजी से सड़क पर उतरती चली गयी|पीछे से दीपा आवाज ही देती रह गयी|
पिछली रात की बारिश सड़क को फिसलना बना गयी थी|जो अशुं भागी तो सड़क की फिसलन उसके कदम सभांल नहीं पायी| लड़खड़ा ही गयी|जो गिरने को हुयी तो दो मजबूत हाथो की पकड़ ने थाम लिया उसे|दीपा को एकाएक हुए इस घटना क्रम को समझने में थोड़ा वक्त लगा|
जब समझा तो देखा अशुं को एक नौजवान गोद में उठाए है|
दीपा को बहूत राहत मिली जैसे|नौजवान कह रहा था`रात की बारिश सड़क को फिसलना कर गयी है| ऐसे में बच्चो को यूं अकेले छोड़ना ठीक नहीं'
उसके कहने में उलहाना नहीं था फि्क थी|दीपा केवल धन्यवाद के दो शब्द ही कह पायी|अजनबी लोगो से बात करना उसे आता ही नहीं था|मगर अशुं उससे बिल्कुल उलट|
यहाँ आने के बाद पहली बार कोई मिला उसे अपनी बेहिसाब बाते करने के लिए|
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