उखड़ती सासों को काबू किया दीपा ने|अपने कमरे में जाने से पहले दीपा ने कमला को आवाज दे चाय लाने को कहा| कमला को दीपा अपने साथ लेती आई थी अपने पीहर से| घर के कामो में सहूलियत के लिए|
अशुं सोई हूई थी|प्यार से हाथ फेरा उसके सिर पर| अशुं का चेहरा बिल्कुल साहिल से मिलता| वही नैन-नक्श|आँखो में पुरानी यादे तैरने लगी जिनमे देर तक डुबती-उतराती रही|
साहिल से उसकी मुलाकात कॉलेज में हूई थी|एक ही साल और एक ही क्लास|दोनो अगे्रजी साहित्य से पोस्ट ग्रेजुएट कर रहे थे|
दीपा थी बेहद खुबसूरत|क्लास का हर लड़काउससे दोस्ती करने को तरसता था|पर दीपा का दिल साहिल पर आ अटका|साहिल अव्वल था पढ़ाई में|नोट लेने देनेसे शरुु हूई दोस्ती कब प्यार में बदल गयी पता ही नहीं चला|पढ़ाई के आखिरी साल आखिर साहिल ने दीपा के आगे शादी करने का प्रस्ताव रखाकितनी खुश थी दीपा उस दिन|
इधर साहिल की पढ़ाई खत्म हुई उधर उसे उसी कॉलेज में व्याखयाता की नौकरी मिल गयी|
दीपा के तो नहीं पर साहिल के माँ-पिता उनके रिश्ते पर मोहर नहीं लगा पाए|आखिर उन दोनो ने कोर्ट मैरिज कर अलग गृहस्थी बसा ली|दीपा चाहती थी कि वो भी नौकरी कर ले पर साहिल नही तैयार हुआ|शायद ये पहली दस्तक थी|दीपा को अपने अदंर कुछ दरकता सा महसूस हुआ|पर बातो को तूल देना उसे भाता नहीं था|
शादी के कुछ महीने ही बीते होगे किअचानक एक दिन साहिल के माँ पापा आ गए अपने बेटे की गृहस्थी देखने|उन्होने अपना लिया साहिल को| आखिर एक ही तो बेटा था उनका मगर माँ दीपा को अपना नहीं सकी|अपने बेटे से दूर करने का कसूरवार वो दीपा को ही मानती थी|
साहिल के सामने नही मगर उसके हटते ही उनकी आवाजमें तीखापन आ जाता| कटाळो से छलनी कर देती उसका मन| शुरू में साहिल उससे पुरा सहयोग करता मगर धीरे-धीरे उसका रवैया बदलने लगा|माँ दीपा की छोटी गल्तियो को भी तूल देने लगी|दीपा को सब मजूंर था मगर कोई बिना वजह उसे दोष देता रहे ये उसे कतई मजूंर ना था| फिर दीपा का मुँह भी खुल गया
साहिल का प्यारसमय के साथ काफूर हो गया|उसे दीपा में तमाम गल्तियाँ नजर आने लगीउसने दीपा को दबा लेना चाहा पर दीपा स्वाभिमानी थी उसे नहीं मजूंर हुआ इस तरह घुट कर जीना|
फिर वही हुआ|दोनो ने एक दूसरे से अलग हो जाने का मन बना लिया|साहिल को फर्क नहीं पड़ा जैसे पर दीपा बिखर गयी अदंर तक|कानूनी ठप्पा भी जल्द लग गया|अशुं को ले दीपा वापस आ गई अपने माँ बाप के पास|टूटी-बिखरी|माँ ने देखी थी दीपा की ये टूटन इसलिए जब स्कूल का appointment letter देखा दीपा के हाथ में तब दीपा से ज्यादा माँ को सुकून मिला| आखिर एक मकसद तो बना और मिली दम घोटू वातावरण से आजादी|
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