हाफनें ही लगी दीपा पहाड़ी रास्ते पर चढ़ते हुए|आदत जो नहीं|सीधे-सपाट रास्तो पर चलने की आदत थी पहाड़ी घुमावदार रास्ते थका डालते उसे|
कुछ दिनो पहले ही तो आ बसे थे यहाँ|दीपा का नया घर पहाड़ में ऊचाँई में बना था|जिस तक चढ़ने उतरने में हफंनी आ जाती उसे|यहाँ किसी को जानती नहीं थी इस वजह से जो घर दिला दिया गया उसी में उसे जाना पड़ा|
एक पहुँचने की ही मजबूरी थी वरना उस घर से दिखती वादियाँ और ऊँची-ऊँची पहाडियाँ मन को एकदम तरोताजा कर जाती|सारी थकान पल भर में गायब हो जाती|
सितम्बर की गुलाबी ठड़ शुरु हो चुकी थी|दिल्ली की उमस से तो निजात मिली|दीपा ने सोचा मगर अभी कहाँ ढाल पायी थी वो अपने को|नयी जगह,नये लोग,नया माहौल सब अजनबी था अभी उसके लिए| उसकी छोटी सी बेटी अंशु भी परेशान थी नये अजनबी अजनबी माहौल में आ कर| मगर माँ के आगे अपना मन नहीं खोला उसने| समय से पहले बड़ी जो हो गयी थी|
कभी-कभी दीपा को लगता कि वो नहीं बल्की अशुं ही उसकी माँ है|कहाँ से ले आयी नन्ही सी बच्ची इतना स्रब|ढेर सा प्यार उमड़ आया दीपा को अपनी बिटिया पर|
दीपा को यहाँ के बोर्डिग स्कुल में नौकरी मिली थी| तनख्वाह अच्छी थी और इस नौकरी की जरूरत थी दीपा को|अशुं को भी दाखिला मिल गया था इसी स्कुल में|इतनी सहूलियत मिल गयी तभी अपनो को छोड़ इतनी दूर आ जाने को राजी हूई थी वो|
दीपा नहीं मगर उसकी माँ चाहती थी कि दीपा इस दमघोटू माहौल से दूर निकले और नये सिरे से शुरु करे अपना जीवन|
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