सारा हाल अलका से सुन उसके माँ -पापा सकते की स्थिती में आ गए| क्या सोच रहे थे और क्या हो गया|मौन पसर गया तीनो के बीच|फिर अलका के पापा बोल उठे'मत चिंता कर बेटी हम हैं अभी| अब हमारे साथ ही वापस जायेगी| इतना सुन लेने के बाद तेरा यहाँ रुकना नहीं बनता|हमारे साथ चल आगे जो होगा सो देखेगे| जो हम चारो साथ हैं तो हर मुश्किल से पार पा लेगे|'
पापा के सहलाते शब्द अलका के लिए काफी थे| जो आसूँओ का बांध इतने दिनो से सहेज रखे थे मानो सारी सीमाएं तोड़ बह ही जाना चाहते हो|फूटफूट कर रो दी अलका|माँ ढाढ़स बधांती रही|सभांल नहीं पा रहे थे माँ पापा अपने को|
प्राचीर शाम को जब आया तो अलका के माँ-पापा को देख माथा ठनक गया उसका| बिना पू्र्व सूचना के अचानक|तीनो का उतरा चेहरा और बंधा सामान किसी अनचाहे की तरफ इशारा कर रहे थे|
बात का सिरा अलका के पापा ने ही पकड़ा' नहीं अच्छा किया तुमने मेरी बेटी के जीवन से खेल कर| गर तुम्हारी कोई बहन होती तो समझ पाते हमारा दर्द|'
प्राचीर को इशारा मिल गया था मगर पुराना चावल था यूँ ही खत्म नहीँ होने देता सो बोल उठा' मैंने ऐसा क्या किया जो इतनी बात सुना दी आपने|हद कर दी आपने'
ये सुन अलका का जी जल उठा|मक्कारी कितनी हैं|
' किस हद तक धूर्तता है आपमें|हमारी सहनशक्ति हर ली है आपने|कितनी मासूम बन बैठे है आप|केवल मेरी नहीं विधी की जिदंगी भी खराब की आपने'
विधी का नाम सुन हकबका ही गया प्राचीर| बोल बैठा कैसे जानती हो तुम विधी को|
आप से तुम पर उतर आयी अलका' क्या तुम नहीं बताओगे तो हमें मालूम ही नहीं पड़ेगा| सबसे खास सहेली हैं मेरी| जो तुम्हारी मेहरबानी से आज मेरी सौत बन बैठी|
प्राचीर ने अपना आखिरी दावं फेंका ' घर की देहरी मत लाघंना|देहरी के उस पार कुछ नहीं बचेगा तुम्हारे लिए| छोड़ी औरत का कोई सम्मान नहीं होता|' पूरी औकात दिखा रहा था प्राचीर अपनी|
अलका बोली' तुमको बता दूं तुम नहीं मैं छोड़ रही हूँ तुम्हे| तुम जैसे लोगो की नजर में छोड़ी औरत का सम्मान नहीं करना चाहिए मगर दो औरत रखने वाले आदमी का सम्मान होना चाहिए'
बात सच थी इसलिए प्राचीर को गहरी चुभी| अलका पर हाथ उठा देना चाहा उसने लेकिन अलका के पापा गरज ही पड़े' खबरदार ऐसी हरकत न करना|हम तीनो काफी है दो मिनट में तुम्हारी इज्जत धोने के लिए|सारी अफसरी यही धरी रह जाएगी| हमें रोकने की सोचना भी मत|'
फिर बेटी का हाथ थामा और चल दिए बाहर की तरफ|
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