छठी किस्त

जब अलका घर पहूँची उसने प्राचीर को बरामदे के चक्कर लगाते पाया|उसको देखते ही सारी मान मर्यादा ताक में रख बरस पड़ा उस पर|अलका के अदंर पहले ही नफरत सी भर गयी थी प्राचीर के लिए| तिस पर उसका ये विद्रुप चेहरा काफी था उसकी नफरत को बढ़ाने के लिए|उसने शादी से लेकर आज की तारीख तक प्राचीर का ये रुप नही देखा था|
"यह कोई आने का समय हैं|जब तमीज नहीं थी अंजान शहर में निकलने की तो जाना जरुरी था क्या|जानु तो मैं भी ऐसी कौन सी खास सहेली हूई तुम्हारी जो मुझे ले जाना भी गवांरा नहीं हुआ तुम्हे|"
वाणी का सयंम खो चुका था प्राचीर जैसे|
थोड़ी देर बाद प्राचीर को अपना कहा महसूस हुआ हो|अलका की तरफ से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हूई|धीरे से समझ भरे अदांज में कहा"तुम क्या नहीं जानती कि इस बीच मुझे कितनी परेशानी हूई|"
      हल्के से व्यंग से अलका सुखी हंसी हंस दी|" सो तो आपको होनी ही थी"
    प्राचीर ने कुछ माहौल को हल्का करने और कुछ अधिक जानने के लिए अलका से पुछ ही लिया
" तुमहारी सहेली का नाम क्या हैं| शादी में तो आना नहीं हुआ उसका| आने में इतनी देर भी लगा दी"
  अलका ने अभी बात को उधेड़ना नहीं चाहा इसलिए झुठ बोल गयी"अचला के यहाँ गयी थी|विवेकानन्द रोड पर रहती हैं| इतने दिनो बाद देखा तो खाने पर रोक लिया| तुम्हारे लिए पुछ रही थी| मैंने कह दिया देर-सवेर मुलाकात हो ही जाएगी|"
   गहरी नजरो से देखा अलका ने प्राचीर को|अपने को रोक नहीं पायी और कह ही बैठी" सबसे बड़ी बात उसके ससुर भी बैकं में हैं|"
    इस बात पर प्राचीर बहुत बैचेन सा दिखा मानो ये सोच रहा हो कि इस बाबत अलका से और कुछ पुछे या नहीं|नजर उठा अलका को देखने लगा मगर अलका सहज बनी रही|
    दूसरे दिन दोनो वापस मुबंई रवाना हो गये|अलका वहाँ भी समान्य बनी रही|मगर एक बात जो उसने की वो ये कि उसने अपने माँ पापा को मुबंई बुला लिया|और खोल दी मन की सारी परते जो इतने दिनो से समेटे बैठी थी अपने अदंर|

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