पाचंवी किस्त

अलका को विश्वास नहीं हुआ अपने कानो पर| किसी अनर्थ की आंशका ने उसे बैचेन कर दिया
विधी को झकझोर ही तो दिया अलका ने|
      ' विधी,क्या बात है?'मुझे सारी बात जल्दी जल्दी बता| मेरी तो जान निकली जा रही है"
     विधी ने कहा" तु सब सुन सकेगी"
    "हाँ,अलका ने कहा" 
विधी ने कहना शुरु किया"सुन,मैं हूँ प्राचीर की पहली पत्नी| जैसे तेरे लिए ये रहस्य था वैसे मुझे भी आज मालूम हुआ कि प्राचीर ने दूसरी शादी कर ली है| कसुर इतना था मेरा की मैं शादी के इतने सालो बाद भी माँ नहीं बन पायी|
     अलका को लगा की उसका दिल अभी धड़कना भूल जाएगा|उसे सारी तस्वीर साफ होने लगी|क्यों अब तक प्राचीर आगरा न लाने के लिए बहलाता रहा उसे|सब याद आता गया उसे| प्राचीर का बार बार आगरा का चक्कर लगाना|
    उफ इतना नीच,जलील इसांन|मुझे दहेज नहीं चाहिए|शादी जल्दी कर दीजिए| समारोह आडंबररहित हो|अलका नहीं सोच पायी इससे ज्यादा और एक तरफ निढाल हो गिर पड़ी|
    बहूत देर बाद उसे होश आया| विधी बैठी थी उसके सिरहाने|उसकी आँखो से लग रहा था बहूत रोई है वो|अलका उठ कर बैठ गयी|विधी उसके लिए चाय बना लायी थी|पीने की इच्छा न हुई अलका को|सारे मापदड़ तिरोहित हो गये जैसे|जो बात अलका को सबसे ज्यादा मथे डाल रही थी वो यह की उसकी सबसे प्यारी सहेली उसकी सौत|ये दिन भी देखने थे उसे|
       विधी ने ही बात की शुरुआत की|
   " अलका,मुझे मालूम है तुम पर क्या बीत रही है|मगर कूसुर तो हम दोनो का नहीं| कूसुर तो उसका है जो दो शादियाँ रचा आराम से बैठा है|माँ न बन पाना क्या इतना बड़ा कूसुर हो गया की उसने इतना बड़ा कदम उठा लिया|मेरी कोख हरी नहीं हो पायी वो दुःख क्या कम था जो ये पहाड़ भी टुट गया मेरे ऊपर|
   अलका को विधी से अपनी स्थिती कुछ बेहतर लगी|विधी पर तो दोतरफा दुःख पड़ा है|
  विधी ने ही अलका को समझाया" अभी तू घर जा और सामान्य रहने की कोशिश कर|फिर ठड़े मन से आगे की सोचेगे|
   अलका किसी तरह विधी से विदा ले घर जो अब घर नहीं रह गया ,चल दी|

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