चौथी किस्त

एक हफ्ता बीतने को था|अलका  ने एक बहुत पुरानी सहेली से मिलने की इच्छा व्यक्त की|प्राचीर ने हमेशा की तरह ना-नुकुर की|मगर इस बार भी अलका की इच्छा के आगे उसे झुकना ही पड़ा|थोड़ी देर के लिए ही सही प्राचीर अलका को भेजने को तैयार हो गया|जल्दी में नाम भी न बताया उसने अपनी सहेली का|
     इतने दिनो बाद अलका को अपने सामने देख विधी मानो निहाल हो गयी|काफी समय से विधी आगरा में ही बसी थी|अलका ने बताया की वो यहाँ अपनी ससुराल आयी है|
     विधी ने अलका से कहा,'अलका,मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि तुम्हारी ससुराल भी आगरा में है|आगरा में किस जगह|पति का नाम क्या है?तेरे सास ससुर का नाम?ढेरो सवाल पूछ डाले विधी ने|
   हसं ही दी अलका|' एक साथ इतने सवाल| खैर,मेरी ससुराल रामनगर की है|पति का नाम प्राचीर ससुर का नाम लोकनाथ भटनागर और सास का नाम कातां है|फिर अलका हंस के ही बोली और पुछना है तुझे या इतना काफी है|
     विधी को एकबारकी विश्वास नहीं हुआ| फिर भी अपनी तसल्ली के लिए उसने पुछ ही लिया|
    ' तेरे पति प्राचीर क्या मुंबई में काम करते है'
अलका को सुखद आश्चर्य हुआ|'क्या तु जानती है उन्हें|ये भी कमाल हो गया|' बही जा रही थी अलका अपनी ही रौ में|
     पहले ये बता कि क्या तेरे ससुर बैंक में कार्यरत हैं|
'वाह क्या बात है| पुरी जन्म कुड़ली ही निकाल लेगी क्या? तू तो सबको जानती है| मजा ही आ गया फिर तो|' कह अलका कोमल हंसी हंस दी|
   ' हाँ,मैं तो सबको जान गयी पर तु सबको नहीं जानती," विधी ने गहरी सासं लेते हुए कहा|
   "क्यो ये क्यो कहा तूने" अलका अभी भी अपने शरारती अदांज में थी|
       मगर जो नजर उठा उसने विधी को दे़खा तब उसे लगा कि मामला कुछ ज्यादा गंभीर है|
       विधी ने जब कहना शुरु किया तो लगा उसकी आवाज किसी गहरे कुँए से आ रही है|
    अलका मैं तुझे कुछ बताने जा रही हूँ| नहीं जानती कैसे लेगी तू इस बात को मगर दिल मजबूत करना होगा  तुझे"
   अलका को नहीं अंदाज था ऐसे किसी भी मोड़ का|

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